Sunday, April 19, 2026

'INDIA' की एकजुटता से घबराई सरकार: राष्ट्र के नाम संबोधन को बनाया चुनावी अखाड़ा

शुक्रवार को भारतीय लोकतंत्र के मंदिर यानी लोकसभा में जो हुआ, उसने सत्तापक्ष की मंशा और विपक्ष की एकजुटता के बीच के गहरे अंतर्विरोध को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' यानी महिला आरक्षण विधेयक का लोकसभा में पारित हो पाना केवल सरकार की विधायी विफलता है, बल्कि यह उस छलावे का भी पर्दाफाश है जिसे भाजपा 'महिला सशक्तिकरण' के नाम पर देश के संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक संतुलन को बिगाड़ने के लिए इस्तेमाल करना चाहती थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में जिस भाषा और लहजे का प्रयोग किया, वह उनके पद की गरिमा के अनुकूल कतई नहीं था। विपक्षी दलों - कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके - को 'महिला विरोधी' करार देना और उन्हें 'परिवारवादी' कहकर अपमानित करना एक चुने हुए प्रधानमंत्री की हताशा को दर्शाता है। क्या प्रधानमंत्री यह भूल गए हैं कि लोकतंत्र में असहमति का अधिकार मौलिक है? क्या वह यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि विपक्षी गठबंधन 'INDIA' की एकजुटता ने उनके उस गुप्त एजेंडे पर पानी फेर दिया है, जो आरक्षण की आड़ में उत्तर और दक्षिण भारत के राजनीतिक संतुलन को अस्थिर करने वाला था?

आरक्षण या परिसीमन का जाल?

इस विधेयक की विफलता का सबसे बड़ा कारण वह 'शर्त' थी जिसे भाजपा ने बड़ी चालाकी से इसके साथ जोड़ दिया था। विधेयक में प्रावधान था कि महिला आरक्षण तभी लागू होगा जब नई जनगणना और उसके बाद नया 'परिसीमन' पूरा हो जाएगा। विपक्ष का तर्क अत्यंत तार्किक था - यदि सरकार महिलाओं को वास्तव में सशक्त बनाना चाहती है, तो वह 2023 में पारित कानून को आज ही लागू क्यों नहीं करती? इसे भविष्य के परिसीमन से जोड़ना क्या महिलाओं के साथ विश्वासघात नहीं है?

सच्चाई यह है कि इस विधेयक की आड़ में भाजपा सरकार लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 के करीब ले जाना चाहती थी। परिसीमन का यह खेल सीधे तौर पर संविधान के साथ छेड़छाड़ करने और उन राज्यों को सजा देने की कोशिश थी जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतरीन काम किया है। दक्षिण भारतीय राज्यों और छोटे उत्तर-पूर्वी राज्यों का यह डर वाजिब है कि यदि जनसंख्या के आधार पर सीटों का विस्तार हुआ, तो उनकी राजनीतिक आवाज दिल्ली के गलियारों में लुप्त हो जाएगी। 'INDIA' गठबंधन ने इसी 'परिसीमन बम' को फटने से रोक दिया है, जिसे प्रधानमंत्री अब 'महिला विरोध' का रंग देने की कोशिश कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री पद की गरिमा का क्षरण

प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन अक्सर चुनावी रैलियों के भाषण जैसा प्रतीत होने लगा है। एक ऐसा पद, जो पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता है, वहां से खड़े होकर आधे विपक्ष को 'अपराधी' और 'नकारात्मक' कहना लोकतांत्रिक परंपराओं पर प्रहार है। प्रधान मंत्री ने कहा कि "देश की महिलाएं इन दलों को माफ नहीं करेंगी।" लेकिन क्या प्रधानमंत्री ने सोचा है कि देश की वे महिलाएं, जो आज भी महंगाई, बेरोजगारी और सुरक्षा के अभाव में जी रही हैं, वह इस राजनीतिक पाखंड को किस रूप में देख रही होंगी?

मणिपुर की महिलाओं के मुद्दे पर मौन साधने वाली सरकार, महिला पहलवानों के प्रदर्शन पर आंखें मूंद लेने वाली सत्ता और हाथरस उन्नाव जैसे मामलों में चुप्पी ओढ़ लेने वाले नेता जब विपक्ष को 'महिला विरोधी' कहते हैं, तो यह विडंबना की पराकाष्ठा लगती है। प्रधानमंत्री का 'उग्र विरोध' के लिए उकसाना क्या लोकतंत्र में अराजकता को निमंत्रण देना नहीं है? एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति जब जनता को विपक्ष के खिलाफ भड़काता है, तो वह केवल गरिमा गिराता है बल्कि संविधान की उस शपथ का भी उल्लंघन करता है जिसमें बिना किसी 'राग-द्वेष' के काम करने का संकल्प लिया गया होता है।

संविधान संशोधन और सत्ता का केंद्रीकरण

भाजपा की मंशा केवल महिलाओं को आरक्षण देना नहीं, बल्कि अपनी सत्ता को स्थाई बनाना है। 543 सीटों के ऊपर अतिरिक्त सीटें बढ़ाना और परिसीमन की प्रक्रिया को अपने पक्ष में मोड़ना, वास्तव में भारत के संघीय ढांचे पर सीधा हमला है। विपक्ष का यह गठबंधन - जिसमें उत्तर से दक्षिण तक की ताकतें शामिल हैं - यह समझ चुका है कि भाजपा आरक्षण के नाम पर एक ऐसा चुनावी नक्शा तैयार करना चाहती है जहां छोटे दलों और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का गला घोंटा जा सके।

यह विधेयक केवल एक संख्या बल का खेल नहीं था, बल्कि यह भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाला दस्तावेज था। विपक्ष ने इसे गिराकर यह संदेश दिया है कि 'अंकगणित' पर 'लोकतंत्र' और 'न्याय' की जीत हुई है। प्रधानमंत्री द्वारा कांग्रेस और उसके सहयोगियों को 'परिवारवादी' कहना एक पुराना और घिसा-पिटा राग है। आज की राजनीति में असली मुद्दा 'परिवार' नहीं बल्कि 'संविधान की रक्षा' है।

अंततः, प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को यह समझना होगा कि डराने-धमकाने और राष्ट्र के नाम संबोधन को चुनावी मंच बनाने से हकीकत नहीं बदलती। महिला आरक्षण का गिरना विपक्ष की जीत नहीं, बल्कि सरकार के उस अहंकार की हार है जिसने महिलाओं के अधिकारों को राजनीतिक सौदेबाजी का जरिया बना लिया था।

प्रधानमंत्री को अपनी भाषा में शालीनता और विपक्ष के प्रति सम्मान वापस लाना चाहिए। लोकतंत्र केवल बहुमत से नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने के 'विवेक' से चलता है। अगर भाजपा वास्तव में 'नारी शक्ति' की चिंता करती है, तो उसे बिना किसी 'किंतु-परंतु' और 'परिसीमन' के पेंच के बिना, तत्काल आरक्षण लागू करने का साहस दिखाना चाहिए। अन्यथा, यह स्पष्ट माना जाएगा कि भाजपा के लिए महिलाएं केवल 'वोट बैंक' हैं और संविधान केवल एक ऐसी किताब जिसे वे अपनी सुविधा के अनुसार बदलना चाहते हैं।

प्रधानमंत्री जी, पद की गरिमा बचाए रखिए, राजनीति तो आती-जाती रहेगी।

- Abhijit

19/04/2026

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