Wednesday, April 8, 2026

खड़गे का 'सांप' वाला बयान और भाजपा का दोहरा मापदंड: क्या अब सच बोलना भी अपराध है?

भारतीय राजनीति का स्तर पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह गिरा है, वह किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में असम की एक चुनावी रैली में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भाजपा और आरएसएस की तुलना 'जहरीले सांप' से की। इस बयान के बाद मानो भाजपा के खेमे में भूचाल गया है। एफआईआर दर्ज कराई जा रही हैं, नैतिकता के पाठ पढ़ाए जा रहे हैं और इसे 'लोकतंत्र की हत्या' करार दिया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या खड़गे ने जो कहा वह केवल एक उपमा थी या उसके पीछे कोई गहरा राजनीतिक और सामाजिक तर्क था? और सबसे बड़ा सवाल - क्या भाजपा को 'अमर्यादित भाषा' पर ज्ञान देने का नैतिक अधिकार है?

खड़गे के बयान का तर्क: विचारधारा की लड़ाई या व्यक्तिगत हमला?

मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपनी रैली में कहा कि "कुरान में लिखा है कि नमाज पढ़ते समय भी अगर जहरीला सांप सामने जाए, तो नमाज छोड़कर पहले सांप को मारना चाहिए।" उन्होंने आगे जोड़ा कि आज भाजपा और आरएसएस देश के लिए उसी सांप की तरह हैं, जिन्हें यदि राजनीतिक रूप से नहीं रोका गया, तो देश का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

यहाँ खड़गे का तर्क हिंसक नहीं, बल्कि वैचारिक था। सांप का उपयोग उन्होंने 'विभाजनकारी विचारधारा' के प्रतीक के रूप में किया। एक ऐसी विचारधारा जो समाज के ताने-बाने को डस रही है, जो भाईचारे के जहर घोल रही है और जो संवैधानिक संस्थाओं को निगल रही है। जब खड़गे 'मारने' की बात करते हैं, तो एक लोकतांत्रिक नेता के रूप में उनका आशय 'चुनावी हार' और 'वैचारिक अंत' से होता है। लेकिन भाजपा ने अपनी सुविधा के अनुसार इसे 'हिंसा के आह्वान' के रूप में पेश किया ताकि मूल मुद्दों से ध्यान भटकाया जा सके।

भाजपा का 'सेलेक्टिव' गुस्सा और प्रधानमंत्री की भाषा

यह बड़ी विडंबना है कि जो पार्टी आज खड़गे के बयान पर नैतिकता का चोगा ओढ़े बैठी है, उसके सर्वोच्च नेता स्वयं किस तरह की भाषा का प्रयोग करते रहे हैं? क्या हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'शहजादा', 'कांग्रेस की विधवा', 'पिंजरों का खेल' या हाल के चुनाव प्रचारों में 'मुगल मानसिकता' और 'मंगलसूत्र' जैसे बयान याद नहीं हैं?

जब प्रधानमंत्री खुद विपक्ष को 'दीमक' या 'देशविरोधी' करार देते हैं, तब भाजपा के नेताओं को 'राजनीतिक मर्यादा' की याद क्यों नहीं आती? अमित शाह जब चुनावी मंचों से 'उखाड़ फेंकने' या विपक्षी नेताओं को व्यक्तिगत रूप से अपमानित करने वाले विशेषणों का प्रयोग करते हैं, तब पुलिस थाने तक शिकायत क्यों नहीं पहुँचती?

सच्चाई यह है कि भाजपा ने भारतीय राजनीति में 'विषैली भाषा' का एक ऐसा मानक स्थापित कर दिया है, जहाँ विरोधियों को दुश्मन समझा जाता है। आज जब खड़गे ने उन्हीं की भाषा में उन्हें आईना दिखाया, तो उन्हें मिर्ची लग रही है।

सत्ता का अहंकार और विपक्ष की घेराबंदी

असम में रंजीव कुमार शर्मा द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत और पुलिस की त्वरित कार्रवाई यह दर्शाती है कि सत्ता पक्ष किस तरह सरकारी मशीनरी का उपयोग विपक्ष की आवाज दबाने के लिए कर रहा है। खड़गे एक दलित नेता हैं और कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। उनका बयान उस हताशा और चिंता से उपजा है जो आज देश का एक बड़ा वर्ग महसूस कर रहा है - संविधान को बदलने की कोशिशों और सांप्रदायिकता के बढ़ते खतरे की चिंता।

भाजपा को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में आलोचना का स्वागत होना चाहिए, कि उसे एफआईआर के जरिए कुचलने की कोशिश। यदि 'सांप' कहना आपत्तिजनक है, तो 'घुसपैठिया' या 'वोट जिहाद' जैसे शब्दों का प्रयोग करना क्या राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देता है?

दोहरे मापदंडों का अंत जरूरी है

राजनीति में भाषा की शुचिता बनी रहनी चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन यह नियम केवल विपक्ष पर लागू नहीं होना चाहिए। यदि खड़गे का बयान 'जहरीला' है, तो भाजपा के नेताओं के पिछले दस वर्षों के बयानों की एक लंबी फेहरिस्त है जो समाज में नफरत का जहर घोल चुकी है।

असम की जनता और देश की जनता देख रही है कि कैसे एक तरफ तो प्रधानमंत्री 'सबका साथ' का नारा देते हैं और दूसरी तरफ उनकी पार्टी विपक्ष के हर शब्द पर कानून का डंडा चलाती है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने जो तर्क दिया, वह उस खतरे की चेतावनी थी जो देश की धर्मनिरपेक्षता पर मंडरा रहा है। भाजपा को शिकायत दर्ज कराने के बजाय आत्मचिंतन करना चाहिए कि आखिर क्यों देश की सबसे पुरानी पार्टी का अध्यक्ष उन्हें 'सांप' की उपमा देने पर मजबूर हुआ।

लोकतंत्र शब्दों के खेल से नहीं, बल्कि नीतियो और न्याय से चलता है। और फिलहाल, भाजपा के पास इन दोनों का ही अभाव नजर रहा है।

- Abhijit

08/04/26

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