19 मार्च की वह सुबह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक और काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई। जब देश सो रहा था, तब सत्ता के गलियारों से निकले एक फरमान ने दर्जनों उन आवाजों का गला घोंट दिया जो सरकार की विफलताओं को बेनकाब कर रही थीं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' (पूर्व में ट्विटर) पर कई महत्वपूर्ण अकाउंट्स को भारत में 'ब्लॉक' कर दिया गया। यह महज़ तकनीकी कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह उस 'राजा' की घबराहट का प्रमाण है जिसे अपनी आलोचना के एक शब्द से भी डर लगता है।
आईटी एक्ट की धारा 69A: दमन का नया हथियार
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 69A का उपयोग जिस तरह से 'द कारवां' (The
Caravan) और अन्य स्वतंत्र पत्रकारों के खिलाफ किया जा रहा है, वह स्पष्ट रूप से असंवैधानिक है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 'X' को जो आदेश थमाया है, वह पारदर्शिता की धज्जियां उड़ाता है। सरकार का तर्क है कि ये अकाउंट्स राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं, लेकिन सच तो यह है कि ये अकाउंट्स केवल 'सत्ता की सुरक्षा' के लिए खतरा थे।
केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव, जो खुद को तकनीक का पैरोकार बताते हैं, आज 'सेंसरशिप के सुल्तान' बनकर उभरे हैं। बार-बार 'X' को ईमेल भेजना और दबाव बनाना यह दर्शाता है कि यह सरकार अब संवाद में नहीं, बल्कि दमन में विश्वास रखती है। जब आप सवाल नहीं पूछ सकते, जब आप तथ्यों को सामने नहीं रख सकते, तो क्या हम वास्तव में एक स्वतंत्र लोकतंत्र हैं?
अश्विनी वैष्णव: आईटी मंत्री या 'सेंसरशिप मंत्री'?
केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव अक्सर तकनीक और प्रगति की बात करते हैं, लेकिन उनके कार्यकाल में अभिव्यक्ति की आज़ादी का ग्राफ जितनी तेज़ी से गिरा है, वह शर्मनाक है। मंत्रालय द्वारा जारी किए गए ये गुप्त आदेश (Blocking Orders) पारदर्शी क्यों नहीं हैं?
क्यों ट्विटर को मजबूर किया जाता है कि वह बिना किसी ठोस कारण के उन हैंडल्स को बंद करे जो लाखों लोगों की आवाज़ बने हुए थे? मंत्री जी को यह समझना चाहिए कि डिजिटल इंडिया का मतलब केवल 'फास्ट इंटरनेट' नहीं, बल्कि 'फ्री स्पीच' भी है। आप ट्विटर पर दबाव डालकर आवाजों को दबा सकते हैं, लेकिन लोगों के मन में सुलग रहे सवालों को कैसे दबाएंगे?
ट्विटर (X) की लाचारी और सरेंडर
यहाँ ट्विटर इंडिया (X Corp) की भूमिका भी कटघरे में है। एलन मस्क जो खुद को 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मसीहा' कहते हैं, भारत में सरकार के आगे घुटने टेक चुके हैं। हालांकि 'X' ने अतीत में इन आदेशों को अदालत में चुनौती दी थी, लेकिन व्यापारिक हितों के कारण वे अब सत्ता के साथ समझौता कर रहे हैं। जब एक ग्लोबल प्लेटफॉर्म भी सरकार के 'हंटर'
से डरकर आवाजों को सेंसर करने लगे, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र आईसीयू (ICU) में है।
मोदी युग: 'विश्वगुरु' या अधिनायकवाद?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत आज 21वीं सदी के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। एक तरफ 'विश्वगुरु' बनने का खोखला ढिंढोरा पीटा जा रहा है, तो दूसरी तरफ नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचला जा रहा है। यह कैसा राष्ट्रवाद है जहाँ सच बोलना 'देशद्रोह' मान लिया जाता है? भाजपा और केंद्र सरकार ने एक ऐसी व्यवस्था तैयार कर दी है जहाँ मुख्यधारा का मीडिया पहले ही नतमस्तक हो चुका है, और अब जो मुट्ठी भर लोग सोशल मीडिया के जरिए जनता को जागरूक कर रहे हैं, उन्हें भी खामोश किया जा रहा है।
यह तानाशाही का वह दौर है जहाँ सरकार को अपनी विफलताओं—बेरोजगारी, महंगाई, और सांप्रदायिक तनाव—पर बात करना पसंद नहीं है। वे चाहते हैं कि जनता केवल वही देखे जो 'आईटी सेल' दिखाना चाहता है।
अघोषित आपातकाल और डरपोक सत्ता
यह कार्रवाई केवल कुछ अकाउंट्स को ब्लॉक करना नहीं है, बल्कि यह उस डर का प्रतीक है जो आज केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के भीतर समाया हुआ है। एक तरफ हम 'मदर ऑफ डेमोक्रेसी' होने का दंभ भरते हैं और दूसरी तरफ जरा सी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते। प्रधानमंत्री मोदी, जो खुद को तकनीक का पैरोकार बताते हैं, उनकी नाक के नीचे सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय सेंसरशिप का वह हथियार चला रहा है जिसे 'सेक्शन 69A' कहते हैं। यह कानून देश की सुरक्षा के लिए बना था, लेकिन आज इसका इस्तेमाल 'साहब' की छवि बचाने के लिए किया जा रहा है।
क्या व्यंग्य करना या सरकार की आलोचना करना अब राष्ट्रद्रोह हो गया है? क्या महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक विफलताओं पर सवाल उठाना देश की संप्रभुता को खतरा पैदा करता है? असल में खतरा देश को नहीं, बल्कि उस झूठे नैरेटिव को है जिसे करोड़ों रुपये खर्च करके बनाया गया है।
राजा डरा हुआ है!
इतिहास गवाह है कि जब-जब शासक अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर जनता की आवाज़ दबाने की कोशिश करता है, तो यह उसकी ताकत नहीं बल्कि उसकी कमजोरी और डर का प्रतीक होता है। राजा डरा हुआ है क्योंकि उसे पता है कि 'द कारवां' जैसे संस्थान जो तथ्य उजागर कर रहे हैं, वे उसकी गद्दी हिला सकते हैं।
यह समय मौन रहने का नहीं है। अगर आज हम इन डिजिटल बेड़ियों के खिलाफ नहीं बोले, तो कल हमारे पास बोलने के लिए शब्द भी नहीं बचेंगे। भारत किसी एक पार्टी या व्यक्ति की जागीर नहीं है। यह 140 करोड़ भारतीयों का देश है, जिनका संविधान उन्हें अपनी राय रखने का अधिकार देता है।
भाजपा और सरकार की दमनकारी नीति
भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसा ईकोसिस्टम तैयार किया है जहाँ 'सत्य' केवल वही है जो सरकारी विज्ञापनों में छपता है। अगर कोई स्वतंत्र पत्रकार या जागरूक नागरिक सोशल मीडिया के जरिए उस झूठ का पर्दाफाश करता है, तो उसे चुप कराने के लिए हर हथकंडा अपनाया जाता है। आईटी रूल्स 2021 और अब प्रस्तावित नए संशोधन इस बात का प्रमाण हैं कि सरकार डिजिटल स्पेस पर पूर्ण नियंत्रण चाहती है।
19 मार्च की इस कार्रवाई में उन अकाउंट्स को निशाना बनाया गया जो व्यंग्य और कार्टून के जरिए सरकार के अहंकार पर चोट करते थे। जब आप कार्टून और पैरोडी से डरने लगें,
तो समझ लीजिए कि आपकी सत्ता की बुनियाद हिल चुकी है। हास्य और व्यंग्य किसी भी जीवंत लोकतंत्र की पहचान होते हैं, लेकिन यहाँ तो 'दुखती रग' पर हाथ रखते ही डिजिटल फाँसी का फंदा तैयार कर दिया जाता है।
जनता की अदालत और भविष्य का सवाल
सरकार को यह भ्रम है कि आवाजों को बंद करने से सच छिप जाएगा। इतिहास गवाह है कि जब-जब ज़ुबान पर ताले लटकाए गए हैं, तब-तब क्रांति और प्रखर होकर उभरी है। आज आपने डॉ. निमो यादव या नेहरू_हू को ब्लॉक किया है, कल हज़ारों नए अकाउंट्स खड़े होंगे। आप तकनीक को सेंसर कर सकते हैं, लेकिन असंतोष को नहीं।
प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को यह याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता मालिक होती है, नौकरशाह या मंत्री नहीं। सूचनाओं का प्रवाह रोकना और आलोचना को कुचलना तानाशाही के लक्षण हैं। अगर भारत को वाकई विश्वगुरु बनना है, तो उसे आलोचना सुनने का साहस जुटाना होगा।
अश्विनी वैष्णव और ट्विटर इंडिया की यह जुगलबंदी भारत के संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है। हम चुप नहीं बैठ सकते। आज उनके अकाउंट्स बंद हुए हैं, कल आपकी आवाज़ पर भी हमला होगा। यह समय एकजुट होकर इस डिजिटल तानाशाही के खिलाफ खड़े होने का है।
साथियों, आवाज़ उठाओ!
देश के तमाम बुद्धिजीवियों, युवाओं और जागरूक नागरिकों को इस अन्याय के खिलाफ एक साथ खड़ा होना चाहिए। यह लड़ाई केवल ट्विटर अकाउंट्स की नहीं है, यह भारत की आत्मा को बचाने की लड़ाई है। हमें यह स्पष्ट करना होगा कि हम 'विश्वगुरु' के नाम पर 'अंधभक्त' नहीं बनेंगे, बल्कि एक ऐसे भारत की मांग करेंगे जहाँ सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि नागरिक का धर्म हो।
सत्ता को याद रखना चाहिए—आप अकाउंट्स ब्लॉक कर सकते हैं, विचार नहीं। आप स्क्रीन काली कर सकते हैं, सत्य का सूरज नहीं ढंक सकते।
सच्चाई को ब्लॉक किया जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता। सत्ता के अहंकार का अंत हमेशा जनता की चेतना से होता है, और वह चेतना अब जाग चुकी है।
उठो, जागो और बोलो! क्योंकि चुप रहना भी इस दमनकारी व्यवस्था का साथ देना है।
- Abhijit