
मध्य पूर्व की राजनीति हमेशा से एक ऐसी बिसात रही है जहाँ मोहरे और चालें अक्सर आम इंसानों की समझ से परे होती हैं। लेकिन हाल के दिनों में अमेरिका, ईरान और पाकिस्तान के बीच 'युद्धविराम' को लेकर जो नाटक देखने को मिला है, उसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गिरते स्तर को पूरी दुनिया के सामने नंगा कर दिया है।
एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी "डील-मेकिंग" छवि को चमकाने में लगे हैं, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ खुद को दुनिया का सबसे बड़ा मध्यस्थ साबित करने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। इस पूरे प्रकरण में जो बात सबसे भयावह है, वह है सच का गला घोंटना और लेबनान जैसे देशों को युद्ध की आग में जलने के लिए अकेला छोड़ देना।
शहबाज शरीफ का सफेद झूठ और कूटनीतिक अपरिपक्वता
सबसे पहले बात करते हैं पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की। पाकिस्तान, जो खुद आर्थिक और राजनीतिक रूप से दिवालिया होने की कगार पर है, उसके प्रधानमंत्री ने अचानक यह दावा कर दिया कि अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो हफ्तों के युद्धविराम में लेबनान भी शामिल है। शरीफ ने सोशल मीडिया पर बड़े गर्व के साथ घोषणा की कि यह युद्धविराम "हर जगह" लागू होगा, जिसमें लेबनान का मोर्चा भी शामिल है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या शहबाज शरीफ को वाकई इस समझौते की शर्तों का ज्ञान था, या वे केवल अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आने के लिए झूठ का सहारा ले रहे थे? कूटनीति में शब्दों का बहुत महत्व होता है, लेकिन शरीफ ने जिस तरह का गैर-जिम्मेदाराना बयान दिया, उसने न केवल पाकिस्तान की बची-कुची साख को मटियामेट किया, बल्कि लेबनान के उन लाखों लोगों को भी झूठी उम्मीद दी जो हर पल इजरायली बमबारी के साये में जी रहे हैं।
शरीफ का यह दावा कि "लेबनान समझौते का हिस्सा है", कुछ ही घंटों में ताश के पत्तों की तरह ढह गया जब इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट रूप से इसे खारिज कर दिया। यह देखना शर्मनाक है कि एक देश का प्रधानमंत्री इतने संवेदनशील मुद्दे पर इतना बड़ा झूठ कैसे बोल सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप और व्हाइट हाउस का दोहरा चेहरा
अब आते हैं उस शख्स पर जो खुद को 'शांति का मसीहा' दिखाने की कोशिश कर रहे हैं - डोनाल्ड ट्रंप। ट्रंप ने बड़े गाजे-बाजे के साथ ईरान के साथ दो हफ्ते के युद्धविराम की घोषणा की। लेकिन जैसे ही लेबनान का मुद्दा उठा,
ट्रंप और उनके व्हाइट हाउस ने तुरंत पल्ला झाड़ लिया। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने स्पष्ट कर दिया कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं है।
यह ट्रंप की उसी पुरानी नीति का हिस्सा है - आधा सच बोलना और अपनी सुविधानुसार झूठ को कूटनीति का नाम देना। अगर लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं है, तो फिर यह कैसा 'शांति समझौता' है? क्या इसका मतलब यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच बमबारी रुकने के बावजूद, लेबनान की धरती पर इजरायल के हमले जारी रहेंगे? ट्रंप का यह स्पष्टीकरण दरअसल लेबनान को मौत के मुँह में धकेलने जैसा है।
ट्रंप और नेतन्याहू की जुगलबंदी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उनके लिए शांति केवल एक शब्द है, जिसका इस्तेमाल वे अपनी घरेलू राजनीति और चुनावी फायदों के लिए करते हैं। ट्रंप का "अमेरिका फर्स्ट" और नेतन्याहू का "इजरायल फर्स्ट" मिलकर "ह्यूमैनिटी लास्ट" साबित हो रहा है।
नेतन्याहू का अड़ियल रुख और कूटनीतिक विरोधाभास
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने शहबाज शरीफ के दावों की हवा निकालते हुए साफ कह दिया कि लेबनान पर हमले जारी रहेंगे। यह कूटनीतिक विफलता का चरम है। जब एक पक्ष (पाकिस्तान) दावा करता है कि सब कुछ शांत है और दूसरा पक्ष (इजरायल) बमबारी की बात करता है, तो इसका मतलब है कि पर्दे के पीछे कोई ठोस बातचीत हुई ही नहीं।
नेतन्याहू का अड़ियल रवैया ट्रंप के उस शांति के दावे पर भी सवालिया निशान खड़ा करता है, जिसमें वे कह रहे थे कि "पूरा मध्य पूर्व अब शांति की ओर बढ़ रहा है।" क्या लेबनान मध्य पूर्व का हिस्सा नहीं है? क्या वहाँ गिरने वाले बम शांति का संदेश हैं?
भारत की भूमिका: एक संतुलित और सशक्त प्रहरी
इस पूरे ड्रामे के बीच भारत की भूमिका सबसे संतुलित और जिम्मेदार रही है। भारत ने हमेशा से ही पश्चिम एशिया में 'संपूर्ण युद्ध विराम' की वकालत की है। भारत का रुख स्पष्ट है - शांति खंडित नहीं हो सकती। आप एक मोर्चे पर गोलीबारी रोककर दूसरे मोर्चे पर कत्लेआम की अनुमति नहीं दे सकते।
भारत के लिए ईरान और इजरायल दोनों ही महत्वपूर्ण साझीदार हैं। लेकिन भारत ने कभी भी पाकिस्तान की तरह 'झूठी कूटनीति' का सहारा नहीं लिया। नई दिल्ली का मानना है कि यदि क्षेत्र में स्थायी शांति चाहिए, तो लेबनान और गाजा जैसे ज्वलंत मुद्दों को किनारे रखकर कोई भी समझौता सफल नहीं हो सकता। शहबाज शरीफ की मध्यस्थता का खोखलापन आज पूरी दुनिया के सामने है, जबकि भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' ने एक बार फिर उसे एक विश्वसनीय वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया है।
झूठ की बुनियाद पर खड़ी कूटनीति
आज दुनिया देख रही है कि कैसे शक्तिशाली देशों के नेता अपने अहंकार और झूठ से अंतरराष्ट्रीय स्थिरता को दांव पर लगा रहे हैं। शहबाज शरीफ ने झूठ बोला ताकि वे अपनी जनता के सामने 'ग्लोबल लीडर' बन सकें। डोनाल्ड ट्रंप ने अधूरा सच बोला ताकि वे खुद को दुनिया का सबसे बड़ा 'डील मेकर' साबित कर सकें। और इन सबके बीच पिसाई हो रही है उन मासूम लोगों की, जो युद्ध और कूटनीतिक धोखे के बीच फंसे हुए हैं।
यह समय है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ट्रंप, व्हाइट हाउस और शहबाज शरीफ की इस अवसरवादी राजनीति का विरोध करे। शांति समझौतों की आड़ में लेबनान जैसे किसी विशेष देश को निशाना बनाना बंद होना चाहिए। कूटनीति भरोसे और सच पर टिकी होनी चाहिए, न कि ट्विटर के ट्वीट्स और सफेद झूठ पर।
दुनिया अब समझ चुकी है - चाहे वो ट्रंप का 'गोल्डन एज' का दावा हो या शरीफ की 'मध्यस्थता', ये सब केवल शब्दों का मायाजाल है, जिसके पीछे केवल निजी स्वार्थ और राजनीतिक रोटियां सेंकने की भूख है।
-Abhijit
09/04/2026