गुजरात विधानसभा में पेश की गई भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने राज्य के वित्तीय प्रबंधन की उन परतों को उधेड़ कर रख दिया है, जिन्हें अक्सर भारी प्रचार-प्रसार के पीछे छिपा लिया जाता है। यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों का संकलन नहीं है, बल्कि मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की सरकार के लिए एक गंभीर चेतावनी है। आंकड़े चीख-चीख कर कह रहे हैं कि जिस राज्य को 'विकास का इंजन' कहा जाता है, वह आज कर्ज के बोझ तले दब रहा है, उसकी आय घट रही है और सामाजिक मापदंडों पर वह राष्ट्रीय औसत से भी पीछे छूटता जा रहा है।
कर्ज का बढ़ता जाल: विकास या विनाश?
कैग की रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात का कुल सार्वजनिक ऋण वर्तमान में लगभग 3.80 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। पिछले एक साल में ही इसमें 22 हजार करोड़ रुपये की भारी बढ़ोतरी देखी गई है। सरकार के दावों के उलट, बाजार से लिया गया कर्ज भी 3.11 लाख करोड़ रुपये के स्तर को पार कर गया है।
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और वित्त मंत्री कनु देसाई अक्सर यह दावा करते रहे हैं कि राज्य को ओवरड्राफ्ट लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी है, लेकिन कैग की रिपोर्ट इस आधे सच की कलई खोल देती है। यदि राज्य की वित्तीय स्थिति इतनी ही सुदृढ़ है, तो हर साल हजारों करोड़ का अतिरिक्त कर्ज क्यों लेना पड़ रहा है? कर्ज लेकर घी पीने की यह नीति भविष्य की पीढ़ियों के कंधों पर एक ऐसा बोझ डाल रही है, जिसे उतारना आने वाले समय में असंभव सा प्रतीत होता है।
राजस्व अधिशेष में ऐतिहासिक गिरावट
राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे चिंताजनक संकेत 'राजस्व अधिशेष' में आई 43.41% की भारी गिरावट है। वर्ष 2024-25 के दौरान राज्य का राजस्व व्यय 10,326 करोड़ रुपये बढ़ गया, जबकि राजस्व आय में 4,208 करोड़ रुपये की कमी आई है। यह असंतुलन दर्शाता है कि सरकार के पास अपनी कमाई से अधिक खर्च करने की आदत हो गई है, लेकिन यह खर्च कहां हो रहा है? क्या यह वास्तव में उत्पादक संपत्तियों के निर्माण में जा रहा है या केवल प्रशासनिक तामझाम और प्रचार में?
जब आय घटती है और खर्च बढ़ता है, तो किसी भी राज्य का बजट संतुलन डगमगा जाता है। गुजरात आज इसी दोराहे पर खड़ा है। राजस्व आय में कमी यह भी संकेत देती है कि राज्य की अपनी कर प्रणाली और संसाधन जुटाने की क्षमता में कहीं न कहीं गंभीर खामियां हैं।
केंद्र से मिलने वाली सहायता में कटौती: 'डबल इंजन' की विफलता?
अक्सर 'डबल इंजन' सरकार का हवाला देकर विकास की दुहाई दी जाती है, लेकिन कैग के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। रिपोर्ट बताती है कि केंद्र सरकार से मिलने वाले फंड में भी गिरावट आई है। जनजातीय (ट्राइबल) विभाग के लिए सहायता 1590.17 करोड़ (2023-24) से घटकर 1363 करोड़ रुपये (2024-25) रह गई है। इसी तरह, केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए फंड 7540 करोड़ से कम होकर 6712.86 करोड़ रुपये हो गया है। क्या यह केंद्र और राज्य के बीच समन्वय की कमी है या गुजरात की जरूरतों को दिल्ली में नजरअंदाज किया जा रहा है? आदिवासी समाज, जो पहले से ही हाशिए पर है, उसके बजट में कटौती सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाती है।
सामाजिक सूचकांक: चमक-धमक के पीछे का अंधकार
गुजरात के आर्थिक विकास के दावों के बीच सामाजिक मोर्चे पर राज्य की स्थिति बेहद निराशाजनक है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य की 11.66% आबादी अभी भी गरीबी रेखा के नीचे (BPL) जीवन यापन कर रही है। जब हम 'वाइब्रेंट गुजरात' की बात करते हैं, तो क्या हमें इन गरीबों की सुध नहीं लेनी चाहिए?
सबसे चौंकाने वाला और दुखद आंकड़ा लिंगानुपात का है। गुजरात में प्रति 1000 पुरुषों पर केवल 904 महिलाएं हैं, जो राष्ट्रीय औसत (947) से काफी कम है। एक विकसित समाज का दावा करने वाले राज्य के लिए यह आंकड़ा शर्मनाक है। यह दर्शाता है कि केवल ऊंची इमारतें और एक्सप्रेसवे बना लेने से समाज आधुनिक नहीं हो जाता; महिलाओं की सुरक्षा और उनके प्रति दृष्टिकोण में गुजरात अभी भी बहुत पिछड़ा हुआ है।
साक्षरता दर 84.6% है और जनसंख्या घनत्व 373 है,
जो कि राष्ट्रीय औसत 430 से कम है। हालांकि शिशु मृत्यु दर का राष्ट्रीय औसत (25) से कम होना एक सकारात्मक बिंदु है, लेकिन यह अकेला आंकड़ा पूरी अर्थव्यवस्था और समाज की बदहाली को ढंकने के लिए पर्याप्त नहीं है।
क्या अब भी हम आंखें मूंदे रहेंगे?
भूपेंद्र पटेल सरकार के लिए कैग की यह रिपोर्ट एक आईना है। सरकार को यह समझना होगा कि केवल आंकड़ों की बाजीगरी और बड़े-बड़े आयोजनों से राज्य का भला नहीं होने वाला। जब तक बुनियादी ढांचा, सामाजिक न्याय और राजकोषीय अनुशासन पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक 'गुजरात मॉडल' केवल कागजों तक सीमित रहेगा।
राज्य पर बढ़ता 3.80 लाख करोड़ का कर्ज कोई छोटी बात नहीं है। यह आने वाले संकट की आहट है। यदि सरकार ने समय रहते अपने खर्चों पर नियंत्रण नहीं किया और राजस्व बढ़ाने के ठोस उपाय नहीं किए, तो गुजरात एक गहरे आर्थिक संकट में फंस सकता है। जनता को अब यह पूछना चाहिए कि आखिर यह कर्ज किसके विकास के लिए लिया जा रहा है, क्योंकि गरीबों की संख्या और लिंगानुपात जैसे आंकड़े तो कुछ और ही कहानी सुना रहे हैं।
समय आ गया है कि सरकार प्रचार के मोड से बाहर निकले और जमीनी हकीकत का सामना करे। कैग की रिपोर्ट ने खतरे की घंटी बजा दी है, अब देखना यह है कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोग इसे सुनते हैं या हमेशा की तरह नजरअंदाज कर देते हैं।
- Abhijit