आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ एक छोटी सी गलती पूरी मानवता को विनाश की आग में झोंक सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के प्रमुख डॉ. टेड्रोस एडनॉम घेब्येयियस की हालिया चेतावनी महज एक बयान नहीं, बल्कि उस आसन्न प्रलय की आहट है जिसे सत्ता के भूखे कुछ राजनेता नजरअंदाज कर रहे हैं। डॉ. टेड्रोस ने स्पष्ट कहा है कि युद्ध अब एक 'खतरनाक चरण' में प्रवेश कर चुका है, क्योंकि हमले अब सीधे संवेदनशील परमाणु स्थलों के करीब हो रहे हैं। ईरान का नतांज (Natanz) संवर्धन परिसर हो या इजरायल का डिमोना (Dimona) शहर—जहाँ दोनों देशों के परमाणु केंद्र स्थित हैं—इन इलाकों में बढ़ती सैन्य गतिविधियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि युद्ध अब 'कंट्रोल' से बाहर हो रहा है।
नेतन्याहू: युद्ध को निजी कवच बनाने की राजनीति
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी कट्टरपंथी सरकार इस पूरे संकट की सबसे बड़ी जिम्मेदार मानी जानी चाहिए। नेतन्याहू के लिए यह युद्ध केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि उनके अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने का एक 'सुरक्षा कवच' बन गया है। भ्रष्टाचार के आरोपों और घरेलू विरोध से घिरे नेतन्याहू जानते हैं कि जब तक युद्ध जारी रहेगा, उनकी कुर्सी सुरक्षित है। उनकी सरकार जिस तरह से गाजा से लेकर लेबनान और अब ईरान तक संघर्ष को विस्तार दे रही है, वह वैश्विक शांति के लिए सीधा खतरा है।
इजरायली सेना (IDF) द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों को उकसाने और उन पर गुप्त हमले करने की रणनीति ने तेहरान को जवाबी कार्रवाई के लिए मजबूर किया है। डिमोना जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यदि कोई मिसाइल सीधे परमाणु रिएक्टर को निशाना बना लेती है, तो उससे निकलने वाला रेडिएशन केवल इजरायल या ईरान तक सीमित नहीं रहेगा; यह पूरी नस्लों को तबाह कर देगा। नेतन्याहू सरकार की यह 'आग से खेलने' की नीति आत्मघाती है।
डोनाल्ड ट्रंप: कूटनीति के नाम पर 'डीलमानी' का पाखंड
दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख हमेशा की तरह विरोधाभासी और संदेहास्पद है। एक तरफ ट्रंप की टीम - जिसमें उनके दामाद जारेड कुशनर और सलाहकार स्टीव विटकॉफ शामिल हैं - सीजफायर की बात करने का नाटक कर रही है, तो दूसरी तरफ ट्रंप खुद ईरान की जायज शर्तों को ठुकरा रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि ट्रंप प्रशासन बातचीत की मेज सजाने की कोशिश तो कर रहा है, लेकिन उनकी नीयत में खोट साफ नजर आती है।
ईरान ने बातचीत के लिए बहुत ही तार्किक शर्तें रखी हैं: पहले युद्ध रोका जाए, अब तक हुए नुकसान का हर्जाना दिया जाए और भविष्य में हमला न होने की ठोस गारंटी दी जाए। लेकिन ट्रंप, जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा 'डील-मेकर' कहते हैं, हर्जाने की मांग पर अड़ियल रुख अपनाए हुए हैं। सवाल यह है कि यदि अमेरिका और इजरायल ने ईरान के बुनियादी ढांचे और परमाणु केंद्रों को नुकसान पहुँचाया है, तो उसकी भरपाई की मांग अनुचित कैसे है? ट्रंप की यह जिद दर्शाती है कि वे शांति नहीं, बल्कि ईरान का 'बिना शर्त आत्मसमर्पण' चाहते हैं, जो किसी भी स्वाभिमानी राष्ट्र के लिए संभव नहीं है।
परमाणु स्थलों पर हमले: मानवता के खिलाफ अपराध
परमाणु ठिकानों को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन तो है ही, यह मानवता के खिलाफ एक जघन्य अपराध भी है। डॉ. टेड्रोस की यह चेतावनी कि "परमाणु स्थलों को निशाना बनाना सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए बढ़ता खतरा है", आँखें खोलने वाली होनी चाहिए। हालांकि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने राहत जताई है कि अभी रेडिएशन के संकेत नहीं मिले हैं, लेकिन यह 'राहत' केवल एक पल की देरी है। एक चूक और चेरनोबिल या फुकुशिमा जैसी त्रासदी हमारे सामने होगी, जो मध्य पूर्व के भूगोल को हमेशा के लिए बदल देगी।
बिचौलियों की भूमिका और वैश्विक सन्नाटा
मिस्र, कतर और ब्रिटेन जैसे देश इस संकट को टालने के लिए मध्यस्थता कर रहे हैं, जो सराहनीय है। लेकिन जब तक वाशिंगटन और तेल अवीव अपनी साम्राज्यवादी और विस्तारवादी सोच को नहीं त्यागेंगे, ये प्रयास बेअसर रहेंगे। ट्रंप प्रशासन को यह समझना होगा कि जारेड कुशनर जैसे 'अनौपचारिक दूतों' के जरिए पर्दे के पीछे की राजनीति करने से बेहतर है कि वह ईरान के साथ सीधे और सम्मानजनक संवाद स्थापित करे।
नेतन्याहू सरकार की आक्रामकता और ट्रंप की अहंकारी कूटनीति ने मध्य पूर्व को एक ऐसे बारूद के ढेर पर बिठा दिया है, जिसकी चिंगारी पूरी दुनिया को झुलसा सकती है। समय आ गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय केवल 'चिंता' जाहिर न करे, बल्कि इन नेताओं पर लगाम कसे। यदि आज परमाणु आपदा होती है, तो इतिहास ट्रंप और नेतन्याहू को शांतिदूत नहीं, बल्कि उस तबाही के वास्तुकार के रूप में याद रखेगा जिसने जानबूझकर दुनिया को विनाश की ओर धकेला।
शांति की पहली शर्त 'न्याय' है। ईरान की क्षतिपूर्ति और सुरक्षा गारंटी की मांग को ठुकराकर ट्रंप शांति के रास्ते बंद कर रहे हैं। वहीं, परमाणु ठिकानों के पास धमाके कर नेतन्याहू यह सिद्ध कर रहे हैं कि उन्हें मानवता की कोई फिक्र नहीं है। अब चुनाव दुनिया को करना है—परमाणु विनाश या सम्मानजनक शांति?
- Abhijit