मध्य-पूर्व में बढ़ते युद्ध और ऊर्जा संकट के बीच भारत की जनता एक बार फिर सरकार के दावों और वास्तविकता के बीच फंसी हुई दिखाई दे रही है। 28 फरवरी 2026 की तारीख भारतीय ऊर्जा सुरक्षा के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो चुकी है। जिस समय इजरायल के हमले ईरान के कच्चे तेल के डिपो को धधका रहे थे, उस वक्त दिल्ली के सत्ता गलियारों से 'सब चंगा सी' और 'ऊर्जा की कोई कमी नहीं होगी' के जुमले उछाले जा रहे थे। लेकिन हकीकत को आप जुमलों की चादर से ज्यादा देर तक ढंक नहीं सकते। आज जब देश के रसोई घरों में गैस की किल्लत शुरू हो चुकी है और पेट्रोल पंपों पर सन्नाटा पसरने की आशंका है, तब मोदी सरकार ने अपना असली हथियार निकाला है - आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम (ESMA)।
यहां एक सीधा सवाल है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनके पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी और भाजपा के उन प्रवक्ताओं से, जो टीवी चैनलों पर बैठकर यह दावा कर रहे थे कि भारत के पास रूस से आने वाले तेल का ऐसा 'सुरक्षा कवच' है जिसे कोई युद्ध नहीं भेद सकता। आज वही सरकार डरी हुई है, सहमी हुई है और अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए कड़े कानूनों का सहारा ले रही है।
खोखले दावों की 'सुनामी'
अभी कुछ ही दिन पहले की बात है, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बड़े गर्व से कहा था कि भारत ने अपने तेल आयात के स्रोतों का इतना विविधीकरण कर लिया है कि खाड़ी देशों के युद्ध का हम पर कोई असर नहीं होगा। भाजपा के नेता रैलियों में सीना ठोककर कह रहे थे कि "मोदी है तो मुमकिन है।" लेकिन क्या मुमकिन हुआ? मुमकिन यह हुआ कि जैसे ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आपूर्ति बाधित हुई, सरकार के हाथ-पांव फूल गए।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। सरकार को पता था कि इजरायल और ईरान के बीच तनाव बढ़ रहा है। उन्हें पता था कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होने वाली 20% वैश्विक तेल आपूर्ति किसी भी समय रुक सकती है। फिर भी, जनता को अंधेरे में रखा गया। क्या यह प्रधानमंत्री की सोची-समझी रणनीति थी कि चुनाव और ब्रांडिंग के चक्कर में देश को ऊर्जा संकट की खाई में धकेल दिया जाए?
एस्मा (ESMA): दमन का नया उपकरण?
एस्मा लागू करने का सीधा मतलब यह है कि सरकार मान चुकी है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर है। जब आप आपूर्ति सुनिश्चित नहीं कर पाते, तो आप उन लोगों की आवाज दबाने लगते हैं जो सिस्टम को चला रहे हैं। एस्मा लागू करके आप तेल और गैस क्षेत्र के कर्मचारियों को हड़ताल करने या विरोध करने से रोक रहे हैं। यह एक लोकतांत्रिक सरकार का तरीका नहीं, बल्कि एक ऐसी सत्ता का चेहरा है जो अपनी प्रशासनिक अक्षमता को पुलिसिया ताकत से ढंकना चाहती है।
अगर सब कुछ नियंत्रण में है, अगर पेट्रोल और डीजल का पर्याप्त स्टॉक है, तो फिर इस 'आपातकालीन कानून' की जरूरत क्यों पड़ी? क्या सरकार को डर है कि जनता का गुस्सा सड़कों पर फूटेगा? या फिर यह उन तेल कंपनियों को बचाने का तरीका है जो संकट के नाम पर आने वाले दिनों में कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी करने वाली हैं?
मंत्री, प्रवक्ता और उनकी 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी'
भाजपा के प्रवक्ता अक्सर विदेशी नीति पर ऐसे बात करते हैं जैसे दुनिया की हर बड़ी घटना प्रधानमंत्री मोदी के दफ्तर से तय होती है। लेकिन आज जब ईरान के तेल डिपो जल रहे हैं, तो इन प्रवक्ताओं के पास कोई जवाब नहीं है। वे अब भी यह बताने में लगे हैं कि कैसे भारत एक 'विश्वगुरु' की भूमिका निभा रहा है, जबकि असलियत यह है कि आम आदमी के घर का बजट बिगड़ चुका है।
रसोई गैस की किल्लत शुरू हो चुकी है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सप्लाई रुकने का सीधा असर हमारे एलपीजी आयात पर पड़ा है। क्या प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्रियों ने इसके लिए कोई 'प्लान बी' तैयार किया था? या उनका पूरा ध्यान सिर्फ 'इवेंट मैनेजमेंट' और हेडलाइन मैनेजमेंट पर था?
जवाबदेही किसकी?
मध्य पूर्व के युद्ध ने मोदी सरकार के उस बुलबुले को फोड़ दिया है जिसमें भारत को 'ऊर्जा-सुरक्षित' बताया जा रहा था। जब तक तेल सस्ता था, तब तक सरकार ने टैक्स वसूलकर अपनी तिजोरी भरी। लेकिन जैसे ही संकट आया, बोझ जनता पर डाल दिया गया और सुरक्षा के नाम पर एस्मा जैसे कानून थोप दिए गए।
क्या प्रधानमंत्री इस विफलता की जिम्मेदारी लेंगे? क्या पेट्रोलियम मंत्री अपने उन बयानों के लिए माफी मांगेंगे जिनमें उन्होंने कहा था कि कोई चिंता की बात नहीं है? भारत की जनता को जुमले नहीं, ईंधन चाहिए। उन्हें एस्मा का डर नहीं, बल्कि रसोई गैस की उपलब्धता चाहिए।
आज देश की ऊर्जा सुरक्षा दांव पर है और सत्ता में बैठे लोग सिर्फ और सिर्फ अपनी छवि बचाने के खेल में व्यस्त हैं। यह समय दावों का नहीं, ठोस कार्रवाई का था, जिसमें मोदी सरकार पूरी तरह विफल रही है।
- Abhijit