Tuesday, March 10, 2026

इज़राइल-ईरान युद्ध और तेल की आग: सत्ता का अहंकार और आम आदमी की बर्बादी

दुनिया एक बार फिर विनाश की कगार पर खड़ी है। 28 फरवरी से शुरू हुए इज़राइल और ईरान के बीच के इस खूनी खेल ने अब वह रूप ले लिया है, जिसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है। लेकिन सबसे दुखद यह है कि इस बर्बादी के पीछे उन 'विश्व गुरुओं' और 'ताकतवर नेताओं' का हाथ है, जो शांति की बातें तो मंचों से करते हैं, लेकिन उनकी नीतियां युद्ध की आग में घी डालने का काम करती हैं। आज जब ईरान के तेल डिपो जल रहे हैं, तो सिर्फ ईरान नहीं जल रहा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की रसोई भी झुलस रही है।

सत्ता का उन्माद: नेतन्याहू और ट्रंप की जुगलबंदी

बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप - ये दो ऐसे नाम हैं जिन्हें इतिहास शायद 'शांति के हत्यारों' के रूप में याद रखेगा। इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू अपनी डगमगाती घरेलू राजनीति को बचाने के लिए युद्ध को एकमात्र हथियार मानते हैं। ईरान के नागरिक ठिकानों और तेल डिपो पर हमले करके उन्होंने केवल अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाई हैं, बल्कि मानवीय संकट को भी जन्म दिया है। अब तो अमेरिका भी, जो खुद इस हमले में शामिल रहा है, 'मगरमच्छ के आंसू' बहा रहा है। ट्रंप प्रशासन का यह कहना कि 'इज़राइल को संघर्ष इतना नहीं बढ़ाना चाहिए था', सिर्फ एक पाखंड है। जब आप किसी को हथियार देते हैं, उसे उकसाते हैं, तो आप यह नहीं कह सकते कि उसने गोली क्यों चलाई।

ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति ने पूरी दुनिया को अस्थिर कर दिया है। आज अमेरिका और इज़राइल के बीच जो तथाकथित 'दरार' दिख रही है, वह केवल राजनीतिक स्टंट है। असलियत यह है कि इन नेताओं के अहंकार ने ईरान के मासूम लोगों को भूखों मरने और धुएं में सांस लेने पर मजबूर कर दिया है।

भारत पर मंडराता खतरा: 'अच्छे दिनों' की कड़वी हकीकत

अब बात करते हैं अपने देश की। भारत में भी इस युद्ध की तपिश महसूस की जा रही है। कच्चे तेल की कमी की आहट ने भारतीय बाजारों में हड़कंप मचा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छूने वाली हैं। लेकिन हमारे 'प्रधान सेवक' नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार क्या कर रही है? वह हमेशा की तरह चुप्पी साधे हुए है या फिर अपनी विफलताओं को 'वैश्विक संकट' के पीछे छिपाने की कोशिश कर रही है।

प्रधानमंत्री मोदी, जो खुद को एक वैश्विक शांति दूत के रूप में पेश करते हैं, आज इस संकट पर चुप क्यों हैं? क्या उनकी दोस्ती केवल फोटो खिंचवाने और बड़े-बड़े आयोजनों तक ही सीमित है? भारत की ऊर्जा सुरक्षा आज खतरे में है, लेकिन सरकार के पास कोई ठोस विकल्प नहीं है। जब जनता महंगाई की मार झेल रही है, तब बीजेपी के नेता और मंत्री टीवी चैनलों पर बैठकर विपक्ष को कोसने में व्यस्त हैं।

संसद में हंगामा और बीजेपी का अहंकार

संसद के दोनों सदनों में आज जो दृश्य देखने को मिल रहा है, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल जब सरकार से पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों और मध्य पूर्व के संकट पर जवाब मांग रहे हैं, तो सरकार उन्हें 'देशद्रोही' या 'गुमराह करने वाला' बता रही है। संसद में विपक्ष का शोर जायज है क्योंकि यह शोर भूखी जनता की आवाज है।

लेकिन बीजेपी के मंत्रियों और प्रवक्ताओं का रवैया देखिए - वे बेशर्मी से आरोप लगा रहे हैं कि विपक्ष लोगों को 'भटका' रहा है। क्या पेट्रोल की कीमतों का बढ़ना भ्रम है? क्या महंगाई का बढ़ना झूठ है? नहीं, झूठ तो वह 'विकास' है जो केवल विज्ञापनों में दिखता है। बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व आज अपने अहंकार के सातवें आसमान पर है। उन्हें लगता है कि वे जो कुछ भी करेंगे, जनता उसे राष्ट्रवाद के नाम पर स्वीकार कर लेगी।

जनता की मुसीबत: अराजकता की आहट

भारत में पेट्रोल-डीजल की कमी का मतलब है - सब कुछ महंगा होना। फल, सब्जियां, परिवहन और बिजली - आम आदमी की जेब पहले ही खाली हो चुकी है, अब उस पर डकैती डालने की तैयारी है। अगर जल्द ही सरकार ने इस युद्ध के आर्थिक प्रभावों से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए, तो देश में अराजकता फैलने में देर नहीं लगेगी।

विपक्ष ने हाथ जोड़कर सरकार के सामने विनती की है कि वह इस मुद्दे पर चर्चा करे, लेकिन मोदी सरकार चर्चा से भाग रही है। आखिर क्यों? क्या इसलिए कि उनके पास कोई जवाब नहीं है? या फिर इसलिए कि वे अपने अंतरराष्ट्रीय आकाओं - ट्रंप और नेतन्याहू - को नाराज नहीं करना चाहते?

इज़राइल और अमेरिका के इस युद्ध ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता के भूखे नेताओं के लिए आम इंसान की जान की कोई कीमत नहीं है। चाहे वह तेहरान की सड़कों पर तड़पता बच्चा हो या भारत के किसी पेट्रोल पंप पर लंबी कतार में लगा भारतीय किसान। डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू की विनाशकारी नीतियां और नरेंद्र मोदी की रहस्यमयी चुप्पी और उनके मंत्रियों का अहंकार - यह सब मिलकर एक ऐसी त्रासदी लिख रहे हैं जिसका खामियाजा आने वाली नस्लों को भुगतना होगा।

हमें आज यह पूछने की जरूरत है कि क्या हम ऐसे नेतृत्व के हकदार हैं जो युद्ध को बढ़ावा दे और महंगाई पर आंखें मूंद ले? समय गया है कि जनता इन 'विश्व गुरुओं' के मुखौटों को उतारे और उनसे जवाब मांगे। युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है, और जनता की बर्बादी पर खड़ी की गई 'मजबूत सरकार' असल में सबसे कमजोर होती है।

- Abhijit

10/03/2026