Wednesday, March 4, 2026

गुजरात की 'सेटिंग' राजनीति: जो दिखता है वो होता नहीं, और जो है वो दिखता नहीं

गुजरात की राजनीति के बारे में एक कहावत मशहूर है—"जो दिखता है वो होता नहीं, और जो है वो दिखता नहीं।" लेकिन हाल ही में अमरेली के राजुला में जो दृश्य सामने आए, उन्होंने केवल इस कहावत को पुख्ता किया है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के सबसे स्याह अध्याय की कलई भी खोल दी है। सूरत लोकसभा सीट पर कांग्रेस के 'डस्टबिन' को साफ कर भाजपा को इतिहास की पहली 'निर्विरोध' जीत का तोहफा देने वाले नीलेश कुंभाणी अब आधिकारिक तौर पर भाजपा के शरणागत होने की तैयारी में हैं। लेकिन इस समर्पण से पहले उन्होंने जो स्वीकारोक्ति की है, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष सी.आर. पाटिल की 'चाणक्य नीति' के दावों पर एक करारा तमाचा है।

बदले की आग में स्वाहा होता लोकतंत्र

सूरत का घटनाक्रम महज एक चुनावी तकनीकी खामी नहीं थी, बल्कि यह एक गहरी साजिश और व्यक्तिगत 'सेटिंग' का नतीजा था। नीलेश कुंभाणी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि सूरत में जो हुआ, वह साल 2017 में उनके साथ हुई 'नाइंसाफी' का बदला था। कुंभाणी का कहना है कि 2017 में कांग्रेस ने उन्हें टिकट देकर आखिरी वक्त पर काट दिया था, और आज उन्होंने कांग्रेस के साथ वही किया।

यह बयान कांग्रेस हाईकमान के लिए जितना अपमानजनक है, उससे कहीं ज्यादा यह भाजपा की कार्यशैली पर सवाल उठाता है। क्या भाजपा इतनी लाचार हो गई है कि उसे चुनाव जीतने के लिए ऐसे 'गद्दारों' और 'बदला लेने वाले' मोहरों की जरूरत पड़ रही है? क्या मोदी और शाह का 'लोकतंत्र' अब केवल कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं के जरिए 'मैच फिक्सिंग' करने तक सीमित रह गया है?

सी.आर. पाटिल और 'निर्विरोध' जीत का पाखंड

सूरत की इस 'निर्विरोध' जीत का सेहरा सी.आर. पाटिल के सिर बांधा गया था। भाजपा ने इसे अपनी लोकप्रियता की लहर बताया था। लेकिन कुंभाणी के कबूलनामे ने साफ कर दिया है कि यह लोकप्रियता की लहर नहीं, बल्कि 'खरीद-फरोख्त' और 'साठगांठ' की गंदी नाली थी। जब चुनाव अधिकारी ने कुंभाणी का फॉर्म रद्द किया, तब भाजपा के रणनीतिकारों ने पर्दे के पीछे से खेल खेलकर अन्य आठ उम्मीदवारों के नाम वापस करवा दिए।

प्रश्न यह उठता है कि क्या अमित शाह और मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को मतदाताओं पर भरोसा नहीं रहा? अगर सूरत की जनता भाजपा के साथ थी, तो फिर चुनाव होने देने से डर क्यों था? असल में, यह 'निर्विरोध' जीत जनता के मताधिकार की डकैती थी, जिसे विकास के नाम पर ढका गया।

प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की चुप्पी: मौन सहमति?

प्रधानमंत्री मोदी अक्सर 'लोकतंत्र की जननी' (Mother of Democracy) का उपदेश देते हैं, लेकिन उनके अपने गृह राज्य में लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है। नीलेश कुंभाणी जैसे नेता सरेआम कह रहे हैं कि उन्होंने पार्टी के साथ गद्दारी की और अब वे भाजपा की गोद में बैठने जा रहे हैं। क्या अमित शाह को गर्व है कि उनकी पार्टी की जीत एक ऐसे व्यक्ति के कंधे पर टिकी है जो 'विश्वासघात' को अपना हथियार बताता है?

भाजपा की इस राजनीति ने गुजरात को 'प्रयोगशाला' बना दिया है, जहाँ अब चुनाव नहीं, बल्कि 'सेटिंग' होती है। राजुला में कुंभाणी की सक्रियता और भाजपा नेताओं के साथ उनकी नजदीकी यह दर्शाती है कि सूरत का कांड कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित 'डील' थी।

मनीष दोशी की तीखी प्रतिक्रिया और कांग्रेस की विफलता

कांग्रेस प्रवक्ता डॉ. मनीष दोशी ने कुंभाणी के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया है। लेकिन यहाँ कांग्रेस को भी आत्ममंथन की जरूरत है। आखिर क्यों कांग्रेस ऐसे भितरघातियों को पहचान नहीं पाती? कुंभाणी ने 2017 की कड़वाहट का हवाला देकर अपने पाप को धोने की कोशिश की है, लेकिन यह तर्क केवल एक अपराधी की दलील जैसा है।

कुंभाणी का यह बयान उन हजारों कार्यकर्ताओं के चेहरे पर तमाचा है जिन्होंने सूरत में कांग्रेस के लिए पसीना बहाया। और यह उन लाखों मतदाताओं का अपमान है जिन्हें भाजपा और कुंभाणी की 'जुगलबंदी' ने वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया।

सत्ता की हवस और नैतिकता का पतन

आज गुजरात की राजनीति उस मुकाम पर है जहाँ नैतिकता का कोई स्थान नहीं बचा है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने भारतीय राजनीति में जिस 'गुजरात मॉडल' को पेश किया था, क्या उसकी हकीकत यही है? जहाँ विपक्ष के उम्मीदवारों को डरा-धमकाकर या लालच देकर बिठा दिया जाए?

नीलेश कुंभाणी का भाजपा में जाना केवल एक दल-बदल नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक भ्रष्टाचार का प्रमाण है जिसने भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को खोखला कर दिया है। सी.आर. पाटिल और भाजपा नेतृत्व भले ही इस 'जीत' का जश्न मनाए, लेकिन इतिहास में सूरत की यह जीत 'लोकतंत्र के चीरहरण' के रूप में दर्ज की जाएगी। जनता सब देख रही है, और यह याद रखा जाना चाहिए कि जो राजनीति बदले और गद्दारी की नींव पर खड़ी होती है, उसका पतन भी उतना ही वीभत्स होता है।

बदला कुंभाणी का था, लेकिन हार लोकतंत्र की हुई

- Abhijit

04/03/2026