Wednesday, March 18, 2026

विकास के दावों के बीच हकीकत की पगडंडी पर दम तोड़ती ज़िंदगियां

(फ़ोटो और वीडियो सौजन्य: रफ़ीक़भाई (नसवाड़ी))

गुजरात को अक्सर भारत के 'विकास मॉडल' के रूप में पेश किया जाता है। ऊँची इमारतें, चमकते एक्सप्रेसवे और निवेश के विशाल आँकड़े - ये सब मिलकर एक ऐसी तस्वीर पेश करते हैं जैसे राज्य की सीमाओं के भीतर स्वर्ग उतर आया हो। लेकिन जब हम गांधीनगर के सत्ता गलियारों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भव्य भाषणों से दूर छोटा उदेपुर जिले के नसवाड़ी तालुका के दूरदराज पहाड़ी इलाकों में कदम रखते हैं, तो यह 'विकास' का गुब्बारा फूट जाता है। यहाँ विकास की परिभाषा सड़कों से नहीं, बल्कि उस 'झोली' (कपड़े और लकड़ी का थैला) से तय होती है, जिसमें एक गर्भवती महिला को लादकर कई किलोमीटर पैदल अस्पताल ले जाना पड़ता है।

आज़ादी के दशक और 'विकास' का खोखलापन


आज़ादी के 75 साल बाद भी नसवाड़ी के कुकरदा, नलिया बारी और खोखरा जैसे गांवों की स्थिति मध्यकालीन युग जैसी है। आज जब सरकार बजट सत्र में 'सुदृढ़ स्वास्थ्य सुविधाओं' और 'आदिवासी कल्याण' के नाम पर करोड़ों रुपये बहाने के दावे कर रही है, तब इन गांवों की महिलाएं आज भी पक्की सड़कों के लिए तरस रही हैं।


जब नसवाड़ी की किसी पहाड़ी बस्ती में किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होती है, तो वहाँ 108 एंबुलेंस नहीं पहुँचती। क्यों? क्योंकि वहाँ पहुँचने के लिए सड़क ही नहीं है। चट्टानी रास्ते, खड़ी ढलानें और ऊबड़-खाबड़ पगडंडियां आधुनिक चिकित्सा के लिए अभेद्य दीवार बन चुकी हैं। अंततः, गांव के पुरुषों को कपड़े और लकड़ियों की एक झोली बनानी पड़ती है, जिसमें उस असहनीय दर्द से जूझ रही महिला को बिठाया जाता है। दो से चार किलोमीटर का यह सफर किसी डरावने सपने से कम नहीं होता।

डबल इंजन सरकार: दावों की रेल और हकीकत की धूल


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की 'डबल इंजन' सरकार बार-बार दावा करती है कि आदिवासी क्षेत्रों में सड़कों का जाल बिछा दिया गया है। लेकिन छोटा उदेपुर की ये पथरीली राहें प्रधानमंत्री के 'सबका साथ, सबका विकास' के नारे को मुँह चिढ़ा रही हैं।

सरकार विधानसभा में चिल्ला-चिल्लाकर कहती है कि आदिवासी बजट में भारी बढ़ोतरी की गई है। लेकिन सवाल यह है कि वह पैसा जा कहाँ रहा है? अगर नसवाड़ी के गांवों तक एक एंबुलेंस जाने लायक रास्ता नहीं बन सका, तो क्या यह बजट केवल विज्ञापनों और होर्डिंग्स के लिए है? मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की चुप्पी इन पीड़ित परिवारों के घावों पर नमक छिड़कने जैसी है। क्या प्रशासन को इस बात का अहसास है कि रास्ते की देरी और झोली में ले जाने के दौरान लगने वाले झटकों के कारण कितनी महिलाओं ने सड़क पर ही दम तोड़ दिया? कितने नवजात दुनिया देखने से पहले ही मौत की नींद सो गए?

विधानसभा का बजट बनाम जनता का संकट

वर्तमान में गुजरात विधानसभा का बजट सत्र चल रहा है। सत्ता पक्ष के विधायक और मंत्री आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की 'काल्पनिक' सफलता की गाथाएं सुना रहे हैं। लेकिन क्या मुख्यमंत्री में इतना साहस है कि वे कुकरदा या नलिया बारी के किसी घर में जाकर उन बुजुर्गों की आँखों में देख सकें, जिन्होंने अपनी बेटियों और बहुओं को सिर्फ इसलिए खो दिया क्योंकि अस्पताल 4 किलोमीटर दूर था और पहुँचने का कोई रास्ता नहीं था?

यह विडंबना ही है कि एक तरफ गुजरात 'वाइब्रेंट' होने का ढोंग करता है और दूसरी तरफ आदिवासी भाई-बहनों को इंसान नहीं, बल्कि वोट बैंक समझा जाता है। जब चुनाव आते हैं, तो यही नेता इन दुर्गम पहाड़ियों पर हेलीकॉप्टरों से उतरते हैं, लेकिन चुनाव जीतते ही वे भूल जाते हैं कि उन्हीं पहाड़ियों पर एक माँ अपनी कोख में पल रही जान को बचाने के लिए मौत से जंग लड़ रही है।

मोदी और पटेल सरकार की विफलता का कच्चा चिट्ठा

नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए जिस 'विकास मॉडल' की नींव रखी थी, क्या उसमें आदिवासियों के लिए कोई जगह थी? या विकास का मतलब केवल साबरमती रिवरफ्रंट और गिफ्ट सिटी तक ही सीमित था? उनके उत्तराधिकारी भूपेंद्र पटेल भी उसी ढर्रे पर चल रहे हैं - जहाँ चमक-धमक ज्यादा है और जमीनी सुधार शून्य।

नसवाड़ी की ये घटनाएँ कोई छिटपुट मामले नहीं हैं, बल्कि यह एक व्यवस्थित विफलता है। यह उस अहंकार का परिणाम है जो मानता है कि विज्ञापनों के जरिए हकीकत को बदला जा सकता है। सरकार को यह समझना होगा कि 'वनबंधु कल्याण योजना' जैसी भारी-भरकम योजनाओं का नाम रखने से पेट नहीं भरता और ही सड़कें बनती हैं। सड़कों के लिए पत्थर और डामर की जरूरत होती है, झूठे आश्वासनों की नहीं।

कब जागेगा प्रशासन?

आदिवासी समाज ने हमेशा प्रकृति और देश की रक्षा की है, लेकिन बदले में उन्हें केवल उपेक्षा मिली है। नसवाड़ी के पथरीले रास्ते मोदी और पटेल सरकार की प्राथमिकता की पोल खोल रहे हैं। अगर सरकार वाकई में विकास चाहती है, तो उसे कागजों से निकलकर इन पहाड़ियों तक आना होगा।

नसवाड़ी की वे महिलाएं जो आज भी झोली में ढोई जा रही हैं, वे सिर्फ एक खबर नहीं हैं। वे इस लोकतंत्र की पराजय का प्रतीक हैं। जब तक गुजरात के हर सुदूर गांव तक पक्की सड़क और एंबुलेंस नहीं पहुँचती, तब तक 'विकास' के हर दावे को झूठा और जनविरोधी माना जाना चाहिए। प्रधानमंत्री जी, मुख्यमंत्री जी, आपकी भव्य योजनाओं की चमक में उन आदिवासी माताओं की सिसकियाँ दब गई हैं, जो आज भी आज़ाद भारत में गुलामों जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं।

यह समय दावों का नहीं, हिसाब का है। नसवाड़ी की धूल भरी पगडंडियां आपसे जवाब मांग रही हैं।

- Abhijit

18/03/2026