Saturday, March 7, 2026

क्या भारत की संप्रभुता अब वाशिंगटन के 'वेवर' पर निर्भर है?

आज हर स्वाभिमानी भारतीय के मन में एक ही सवाल है - क्या हम वाकई एक संप्रभु राष्ट्र हैं, या हम धीरे-धीरे अमेरिका के एक 'डिपेंडेंट' राज्य में तब्दील हो चुके हैं? अमेरिकी प्रशासन द्वारा भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए दी गई 30 दिनों की "रियायत" या "वेवर" ने नरेंद्र मोदी सरकार के उस खोखले राष्ट्रवाद की कलई खोल दी है, जिसका ढिंढोरा पिछले एक दशक से पीटा जा रहा है।

यह खबर कि अमेरिका ने भारत को तेल खरीदने की "अनुमति" दी है, किसी भी भारतीय के लिए गर्व का नहीं बल्कि गहरे अपमान का विषय होना चाहिए। यह सवाल सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और उनकी तथाकथित 'मजबूत' विदेश नीति पर प्रहार करता है। आखिर अमेरिका कौन होता है हमें यह बताने वाला कि हम किससे तेल खरीदें और किससे नहीं? और इससे भी बड़ा सवाल यह है कि हमारी सरकार ने इस अपमानजनक स्थिति को स्वीकार कैसे कर लिया?

संप्रभुता का आत्मसमर्पण?

विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस और राहुल गांधी ने सही सवाल उठाए हैं। जब अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट सोशल मीडिया पर घोषणा करते हैं कि वे भारत को रूसी तेल खरीदने की 'अनुमति' दे रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर हमला है। प्रधानमंत्री मोदी, जो 'लाल आंख' दिखाने की बात करते थे, आज डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के सामने नतमस्तक नजर रहे हैं।

विपक्षी दलों का यह आरोप कि पीएम मोदी ने देश के हितों को अमेरिकी हितों की वेदी पर चढ़ा दिया है, आज निराधार नहीं लगता। जिस देश ने नेहरू और इंदिरा गांधी के दौर में वैश्विक दबावों को दरकिनार कर अपनी स्वतंत्र राह चुनी थी, वह आज एक 'वेवर' के लिए वाशिंगटन की ओर टकटकी लगाए बैठा है। क्या यही वह 'विश्वगुरु' बनने का सपना है जो हमें दिखाया गया था?

'मैं देश नहीं झुकने दूँगा' - एक चुनावी जुमला मात्र

प्रधानमंत्री का प्रसिद्ध नारा "मैं देश नहीं झुकने दूँगा" आज एक कड़वे मजाक की तरह लग रहा है। जब ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 25% दंडात्मक टैरिफ लगाए, तब मोदी सरकार ने क्या किया? रिपोर्ट बताती है कि भारत ने अपनी संप्रभुता के साथ समझौता करते हुए रूस से तेल आयात कम कर दिया और अमेरिका से महंगा तेल खरीदने का वादा किया। यह द्विपक्षीय व्यापार नहीं, बल्कि 'डिप्लोमैटिक ब्लैकमेल' है।

आज की स्थिति यह है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया (ईरान-इजरायल) संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में है। हमारी अपनी तेल की जरूरतें पूरी करने के लिए हमें अमेरिका की 'पर्ची' की जरूरत पड़ रही है। बीजेपी नेता इसे 'रणनीतिक कूटनीति की जीत' बता रहे हैं, लेकिन हकीकत में यह भारत की हार है। यह इस बात का प्रमाण है कि मोदी सरकार ने अपनी विदेश नीति की बागडोर व्हाइट हाउस को सौंप दी है।

मोदी सरकार और बीजेपी का दोगलापन

बीजेपी के प्रवक्ता और नेता इस 30 दिनों की छूट को मोदी जी की बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं। वे कहते हैं कि यह 'रणनीतिक स्पष्टता' है। लेकिन यह स्पष्टता नहीं, बल्कि लाचारी है। यदि भारत वास्तव में एक वैश्विक शक्ति है, तो हमें किसी 'वेवर' की आवश्यकता क्यों है? क्या चीन या कोई अन्य स्वाभिमानी राष्ट्र ऊर्जा सुरक्षा के लिए ऐसी अपमानजनक शर्तों को स्वीकार करता?

सरकार के मंत्री और बीजेपी के आईटी सेल राहुल गांधी को 'राष्ट्र-विरोधी' घोषित करने में व्यस्त हैं क्योंकि उन्होंने सच बोलने का साहस किया। राहुल गांधी ने संसद में पहले ही चेतावनी दी थी कि भारत की विदेश नीति किसी एक व्यक्ति की सनक नहीं, बल्कि देश के सामूहिक संकल्प से चलनी चाहिए। आज उनकी बातें सच साबित हो रही हैं - प्रधानमंत्री मोदी एक 'समझौतावादी' नेता के रूप में उभर रहे हैं जो अमेरिकी दबाव के आगे झुक गए हैं।

देश के हितों के साथ खिलवाड़

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 80% से अधिक आयात करता है। रूस से मिल रहा सस्ता तेल आम जनता के लिए राहत हो सकता था, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से मोदी सरकार ने हाथ खींच लिए। अब जब खाड़ी देशों में युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने का खतरा है, तब अमेरिका ने एक 30 दिन का 'लॉलीपॉप' थमा दिया है।

यह 30 दिन का वेवर केवल उन जहाजों के लिए है जो पहले से समुद्र में फंसे हुए हैं। इसका मतलब है कि आगे की राह अभी भी धुंधली है। क्या 30 दिन बाद फिर से पीएम मोदी ट्रंप के सामने हाथ जोड़कर खड़े होंगे? क्या भारत की विदेश नीति अब हर महीने वाशिंगटन से रिन्यू करानी होगी?

यह मुद्दा किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि देश के सम्मान का है। नरेंद्र मोदी सरकार ने 'अमृत काल' का जो भ्रमजाल बुना है, उसके पीछे भारत की संप्रभुता को गिरवी रखा जा रहा है। एक तरफ हम आत्मनिर्भर भारत की बात करते हैं और दूसरी तरफ बुनियादी ऊर्जा जरूरतों के लिए अमेरिका की दया पर निर्भर हैं।

देश की जनता को यह समझना होगा कि मजबूत नेतृत्व का मतलब केवल बड़े भाषण देना नहीं होता, बल्कि संकट के समय देश के स्वाभिमान की रक्षा करना होता है। मोदी जी और उनकी सरकार ने इस मामले में देश को नीचा दिखाया है। आज भारत की संप्रभुता वाशिंगटन के गलियारों में सिसक रही है, और इसका जिम्मेदार केवल और केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अहंकार और उनकी विफल विदेश नीति है।

इतिहास इस आत्मसमर्पण को कभी माफ नहीं करेगा। भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र था, है और रहना चाहिए - लेकिन मोदी राज में यह 'आश्रित राष्ट्र' बनता जा रहा है, जो अत्यंत चिंताजनक है।

- Abhijit

07/03/2026