Friday, April 3, 2026

वैश्विक शतरंज पर चीन की चाल और महाशक्तियों का पतन

आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ पुराने साम्राज्य ढह रहे हैं और नए गठबंधन जन्म ले रहे हैं। एक तरफ अमेरिका, जो कभी खुद को दुनिया का 'थानेदार' समझता था, आज ईरान के साथ युद्ध की आग में खुद को झोंक चुका है। दूसरी तरफ, ड्रैगन यानी चीन अपनी कूटनीतिक बिसात बिछाकर उन जगहों पर कब्जा कर रहा है जहाँ से अमेरिका के पैर उखड़ रहे हैं। हाल ही में उरुमकी में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच चीन की मध्यस्थता में हुई बातचीत इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि एशिया की राजनीति का केंद्र अब वॉशिंगटन नहीं, बल्कि बीजिंग बन चुका है।

डोनाल्ड ट्रंप: एक दिशाहीन 'योद्धा' का पतन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां हमेशा से ही विरोधाभासों का पुलिंदा रही हैं। 'अमेरिका फर्स्ट' का नारा देने वाले ट्रंप ने असल में 'अमेरिका अलोन' की स्थिति पैदा कर दी है। ईरान के साथ युद्ध शुरू करना उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हो रही है। जिस समय अमेरिका को अपनी पूरी शक्ति चीन के विस्तारवाद को रोकने में लगानी चाहिए थी, उस समय ट्रंप ने मध्य-पूर्व के दलदल में अपनी सेना और संसाधन झोंक दिए हैं।

ट्रंप की "मैक्सिमम प्रेशर" नीति ने ईरान को झुकने के बजाय चीन और रूस की गोद में बैठने पर मजबूर कर दिया। आज जब अमेरिका ईरान की खाड़ी में मिसाइलें दाग रहा है, तब उसके अपने सबसे भरोसेमंद साथी जैसे कनाडा और यूरोपीय देश उससे छिटक रहे हैं। कनाडा का चीन की ओर झुकाव यह बताने के लिए काफी है कि दुनिया अब ट्रंप के अनिश्चित और अहंकारी नेतृत्व पर भरोसा करने को तैयार नहीं है। ट्रंप ने अपनी ज़िद में अमेरिका की वह कूटनीतिक विरासत दांव पर लगा दी है, जिसे बनाने में दशकों लगे थे।

शी जिनपिंग: 'शांति दूत' के मुखौटे में एक विस्तारवादी चेहरा

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग आज दुनिया के सामने एक 'मैचमेकर' या विवाद सुलझाने वाले नेता के रूप में उभर रहे हैं। लेकिन क्या यह वाकई शांति की चाहत है? कतई नहीं। उरुमकी में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के तालिबान शासन को एक मेज पर लाना शी जिनपिंग की एक सोची-समझी चाल है। चीन का मकसद अफगानिस्तान में शांति स्थापित करना नहीं, बल्कि वहां के खनिज संसाधनों पर कब्जा करना और अपने 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) को सुरक्षित करना है।

शी जिनपिंग जानते हैं कि जब तक पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा विवाद और आतंकवाद का मुद्दा हल नहीं होता, तब तक चीन का निवेश सुरक्षित नहीं है। चीन की मध्यस्थता कोई परोपकार नहीं है; यह एक आर्थिक और रणनीतिक उपनिवेशवाद है। शी जिनपिंग दुनिया को यह संदेश दे रहे हैं कि जहाँ अमेरिका युद्ध फैलाता है, वहां चीन समाधान देता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि चीन जिस भी देश के आंतरिक मामलों में घुसा है, उसे उसने कर्ज के जाल में फंसाकर अपनी संप्रभुता खोने पर मजबूर कर दिया है।

पाकिस्तान की रणनीति: घुटनों पर खड़ा एक 'किराए का सिपाही'

पाकिस्तान की विदेश नीति हमेशा से ही 'सबसे ऊँची बोली लगाने वाले' के साथ जाने की रही है। दशकों तक अमेरिका की गोद में बैठकर अरबों डॉलर की इमदाद लेने वाला पाकिस्तान आज पूरी तरह से चीन का 'गुलाम' बन चुका है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार का बीजिंग दौरा और उसके तुरंत बाद उरुमकी में बातचीत का शुरू होना यह दर्शाता है कि इस्लामाबाद अब अपनी सुरक्षा नीतियों के लिए भी बीजिंग के आदेशों का मोहताज है।

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी का यह कहना कि चीन अब विवादों को सुलझा रहा है, असल में पाकिस्तान की कूटनीतिक हार का स्वीकारोक्ति है। पाकिस्तान ने तालिबान को पाल-पोसकर बड़ा किया, लेकिन आज वही तालिबान पाकिस्तान के लिए भस्मासुर बन गया है। पाकिस्तान की 'रणनीतिक गहराई' की नीति अब उसी के लिए गड्ढा बन गई है। जब अमेरिका ने दबाव डाला, तो पाकिस्तान ने चीन की शरण ली। लेकिन क्या चीन पाकिस्तान को टीटीपी के हमलों से बचा पाएगा? चीन केवल अपने हितों की चिंता करता है, पाकिस्तान के सैनिकों की जान की नहीं।

अफगानिस्तान और तालिबान: नए खिलाड़ी, पुराने खतरे

तालिबान का चीन पर भरोसा करना यह दिखाता है कि वे अब अंतरराष्ट्रीय मान्यता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। अफगानिस्तान के राजदूतों का चीन पहुंचना और पाकिस्तान के साथ बातचीत करना एक प्रतीकात्मक जीत तो हो सकती है, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और है। तालिबान यह भूल रहा है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का मजहब और विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है। चीन को केवल अपने शिनजियांग प्रांत की सुरक्षा और अफगानिस्तान के लिथियम तांबे से मतलब है।

एक खतरनाक भविष्य की ओर

उरुमकी की मेज पर बैठे ये तीन पक्ष - एक विस्तारवादी चीन, एक लाचार पाकिस्तान और एक कट्टरपंथी तालिबान - दुनिया के लिए एक शुभ संकेत नहीं हैं। अमेरिका की गैर-मौजूदगी में चीन इस क्षेत्र का निर्विवाद स्वामी बनना चाहता है। ट्रंप की युद्धप्रियता ने चीन को वह खाली जगह दे दी है, जिसे वह बड़ी तेजी से भर रहा है।

आज कनाडा जैसे देश अगर चीन की तरफ देख रहे हैं, तो यह अमेरिका की कूटनीतिक विफलता का सबसे बड़ा स्मारक है। दुनिया अब एक 'ध्रुवीय' नहीं रही, लेकिन जिस 'बहुध्रुवीय' दुनिया की हम बात कर रहे हैं, उसमें चीन का बढ़ता दबदबा लोकतंत्र और वैश्विक स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा है।

समय गया है कि दुनिया यह समझे कि 'शांति' के नाम पर चीन जो जाल बिछा रहा है, वह भविष्य के नए संघर्षों की बुनियाद है। और पाकिस्तान जैसे देश, जो अपनी संप्रभुता को बीजिंग के हाथों गिरवी रख चुके हैं, वे केवल इस विनाशकारी नाटक के मोहरे मात्र बनकर रह जाएंगे।

- Abhijit

03/04/2026