Friday, April 10, 2026

किसान हितों का सौदा या 'वॉशिंग मशीन' की शरण? राजू करपड़ा का भगवा चोला और गिरती नैतिकता

(फोटो सौजन्य: भाजपा)

सौराष्ट्र की राजनीति में आज एक ऐसा अध्याय जुड़ा है, जिसे आने वाले समय में 'नैतिकता के पतन' के उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा। बोटाद के प्रसिद्ध किसान नेता राजू करपड़ा, जो कल तक सत्ता की आंखों में आंखें डालकर किसानों के हक की बात करते थे, आज उसी सत्ता की गोद में जा बैठे हैं। 200 कार्यकर्ताओं के साथ भारतीय जनता पार्टी का दामन थामते ही करपड़ा के सुर बदल गए हैं। यह बदलाव केवल एक राजनीतिक दिशा परिवर्तन नहीं है, बल्कि उन हजारों किसानों के भरोसे के साथ विश्वासघात है जिन्होंने उन्हें अपना मसीहा माना था।

संघर्ष की बिसात और समझौतों की राजनीति

राजू करपड़ा का राजनीतिक सफर 2017 से शुरू हुआ, जब उन्होंने एक किसान संगठन के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद की। 2021 में उन्होंने औपचारिक राजनीति में कदम रखा और आम आदमी पार्टी के किसान विंग के अध्यक्ष के रूप में सौराष्ट्र के गांव-गांव तक पहुंचे। 'हड़दड़ कडा' जैसे आंदोलनों में जेल की सलाखें देखने वाले करपड़ा आज उसी सरकार की प्रशंसा कर रहे हैं जिसने उन्हें जेल भेजा था।

जेल से बाहर आने के बाद उनके तर्क बेहद हास्यास्पद और अवसरवादी प्रतीत होते हैं। उनका यह कहना कि "विपक्ष में रहकर या आंदोलन करके किसानों का भला नहीं होता," दरअसल उनके अपने संघर्षों का अपमान है। अगर विपक्ष में रहकर काम नहीं होता, तो क्या वे पिछले पांच वर्षों से केवल अपनी "व्यक्तिगत छवि" चमका रहे थे? क्या किसानों ने उन्हें इसलिए समर्थन दिया था कि वे अंततः सत्ता की मलाई छानने के लिए अपनी विचारधारा बेच दें?

भाजपा की 'वॉशिंग मशीन' और डर का खेल

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि भाजपा ने करपड़ा को 'साम-दाम-दंड-भेद' की अपनी पुरानी नीति के तहत पार्टी में शामिल किया है। करपड़ा पर कई कानूनी मामले लंबित हैं। क्या यह महज इत्तेफाक है कि जेल की कठोरता और मुकदमों के बोझ के बीच अचानक उन्हें "भाजपा में ही किसानों का कल्याण" दिखने लगा?

सच्चाई यह है कि भाजपा आज एक ऐसी 'वॉशिंग मशीन' बन चुकी है, जिसमें विपक्षी दल का कोई भी नेता, चाहे उस पर कितने ही दाग क्यों हों, एक बार केसरिया दुपट्टा ओढ़ ले तो वह 'साफ-सुथरा' हो जाता है। करपड़ा के भाजपा में जाते ही उनके खिलाफ चल रहे मामले ठंडे बस्ते में डाल दिए जाएंगे, यह गुजरात की राजनीति का एक कड़वा लेकिन जगजाहिर सच है। यह लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है, जहां केंद्रीय और राज्य सरकारें अपनी एजेंसियों का उपयोग विपक्ष को खत्म करने और नेताओं को डराकर अपनी तरफ करने के लिए कर रही हैं।

किसानों के साथ बड़ा छल

राजू करपड़ा कहते हैं कि वे किसानों के हित के लिए भाजपा में गए हैं। लेकिन क्या वे भूल गए कि यही वह सरकार है जिसने किसानों के आंदोलनों को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी? क्या सत्ता में जाकर वे कपास के गिरते भाव, खाद की किल्लत और सिंचाई के पानी की समस्याओं को हल करवा पाएंगे? इतिहास गवाह है कि जो नेता 'डील' करके सत्ता में जाते हैं, वे केवल अपने और अपने करीबियों के हितों की रक्षा करते हैं।

करपड़ा का यह बयान कि "मैंने पांच साल मुफ्त सेवा की है," दरअसल एक रक्षात्मक कवच है ताकि वे अपने इस अवसरवादी कदम को जायज ठहरा सकें। सत्ता का मोह अच्छे-अच्छों की मति हर लेता है, और राजू करपड़ा इसका ताजा उदाहरण हैं।

सौराष्ट्र के किसान नहीं भूलेंगे

गुजरात की जनता और विशेषकर सौराष्ट्र के स्वाभिमानी किसान इस विश्वासघात को देख रहे हैं। भाजपा ने भले ही एक नेता को अपनी 'वॉशिंग मशीन' में धोकर शुद्ध करने का दावा किया हो, लेकिन जनता की नजरों में उस नेता की साख अब धुंधली पड़ चुकी है। करपड़ा का यह कदम किसान राजनीति के ताबूत में एक और कील है।

राजनीति जब जनसेवा के बजाय व्यक्तिगत सुरक्षा का माध्यम बन जाए, तो वह समाज का भला नहीं, बल्कि विनाश करती है। राजू करपड़ा ने भाजपा का दामन थामकर खुद को तो बचा लिया होगा, लेकिन किसानों की लड़ाई को बीच राह में छोड़कर उन्होंने जो पाप किया है, उसका हिसाब वक्त जरूर मांगेगा।

- Abhijit

10/04/2026