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Saturday, December 20, 2025

लोकतंत्र की 'शुद्धता' या मतदाताओं को 'निकाला'? गुजरात SIR पर गंभीर सवाल

(प्रतीकात्मक फोटो)

गुजरात की चुनावी राजनीति में हाल ही में एक ऐसा 'डिजिटल और प्रशासनिक चमत्कार' हुआ है, जिसने लोकतंत्र के बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने राज्य में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) यानी 'विशेष गहन पुनरीक्षण' की प्रक्रिया पूरी की और नतीजा यह निकला कि रातों-रात गुजरात की मतदाता सूची से करीब 73.73 लाख नाम गायब हो गए।

यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, यह करोड़ों नागरिकों के संवैधानिक मताधिकार पर किया गया एक अभूतपूर्व प्रहार है। एक झटके में राज्य के कुल मतदाताओं की संख्या 5.08 करोड़ से घटकर लगभग 4.34 करोड़ रह गई है। सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में सूची का 'शुद्धिकरण' है, या फिर यह लाखों पात्र नागरिकों को चुनावी प्रक्रिया से बाहर करने की एक सुनियोजित प्रशासनिक साजिश?

क्या 15% आबादी अचानक 'गायब' हो गई?

निर्वाचन आयोग का तर्क है कि ये नाम मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित (migrated) या दोहरी प्रविष्टि वाले मतदाताओं के थे। लेकिन जरा सोचिए, क्या किसी भी जीवंत लोकतंत्र में यह संभव है कि राज्य के लगभग 15% मतदाता अचानक 'अपात्र' हो जाएं? 73 लाख का आंकड़ा किसी छोटे देश की जनसंख्या के बराबर है।

आयोग ने जिस 'गहन पुनरीक्षण' का हवाला दिया है, उसकी पारदर्शिता पर कई बड़े सवाल खड़े होते हैं:

दस्तावेजों का बोझ: इस प्रक्रिया के दौरान नागरिकों पर अपनी नागरिकता और पात्रता साबित करने का जो बोझ डाला गया, उसने गरीब और हाशिए के समुदायों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। क्या निर्वाचन आयोग यह भूल गया है कि वोट देना एक अधिकार है, जिसके लिए सरकार को नागरिक के द्वार तक जाना चाहिए, न कि नागरिक को सरकारी दफ्तरों की चौखट पर 'सबूत' लेकर खड़ा होना पड़े?

आधार और राशन कार्ड की अनदेखी: कई रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती चरणों में आधार कार्ड जैसे ठोस पहचान पत्रों को स्वीकार करने में आनाकानी की गई। जब राज्य खुद डिजिटल इंडिया का डंका पीटता है, तो फिर मतदाता सूची के सत्यापन में आधार को दरकिनार करना किस मंशा को दर्शाता है?

प्रक्रिया की जल्दबाजी: बिहार के बाद गुजरात में जिस तरह से यह SIR प्रक्रिया अचानक और तेजी से लागू की गई, उससे जमीनी स्तर पर (BLO लेवल पर) भारी अव्यवस्था देखने को मिली। लाखों लोग इस बात से अनभिज्ञ रहे कि उनका नाम काटने की तैयारी चल रही है।

लोकतंत्र में 'अदृश्य' होता नागरिक

निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी 'प्योरिटी' (शुद्धता) के नाम पर छंटनी करना नहीं, बल्कि 'इन्क्लूसिविटी' (समावेशिता) सुनिश्चित करना है। जब 73 लाख नाम काटे जाते हैं, तो उनमें से कितने ऐसे पात्र नागरिक होंगे जिनके पास दस्तावेज की कमी थी या जो काम के सिलसिले में घर पर मौजूद नहीं थे?

यह सीधे तौर पर चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठाता है। यदि चुनाव से ठीक पहले एक विशेष विचारधारा या वर्ग के मतदाताओं का नाम 'तकनीकी खामी' बताकर हटा दिया जाता है, तो क्या वह चुनाव वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष कहलाएगा?

अब जागने का वक्त है

गुजरात की नागरिक संस्थाएं और सजग नागरिक इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट तक जाने की तैयारी कर रहे हैं, जो एक स्वागत योग्य कदम है। लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की है। आयोग को यह समझना होगा कि मतदाता सूची से एक भी पात्र व्यक्ति का नाम कटना 'संवैधानिक विफलता' है।

73 लाख लोगों के नाम का कटना 'त्रुटि' नहीं, एक 'त्रासदी' है। अगर हम आज चुप रहे, तो कल 'डिजिटल इंडिया' की मतदाता सूची में केवल वही नाम बचेंगे जिन्हें तंत्र देखना चाहता है, जनता नहीं।

लोकतंत्र की आत्मा उसके मतदाताओं में बसती है, और जब मतदाताओं को ही 'अदृश्य' कर दिया जाए, तो लोकतंत्र केवल एक कागजी ढांचा बनकर रह जाता है।

- Abhijit

20/12/2025