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Friday, January 9, 2026

‘वंदे मातरम्’ से शुरू हुआ अविश्वास का पत्र: क्या गुजरात में सरकार नाम की कोई व्यवस्था बची है?

गुजरात की तथाकथित “सुशासन” वाली छवि एक बार फिर कठघरे में खड़ी है। वडोदरा ज़िले के पाँच भाजपा विधायक—केतन इनामदार, अक्षय पटेल, शैलेष मेहता, चैतन्यसिंह झाला और धर्मेंद्रसिंह वाघेला—ने मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को जो पत्र लिखा है, वह सिर्फ़ अफ़सरशाही पर सवाल नहीं उठाता, बल्कि पूरी राज्य सरकार की कार्यप्रणाली की पोल खोल देता है। यह कोई साधारण शिकायत पत्र नहीं है, बल्कि सत्ता और प्रशासन के बीच गहराते अविश्वास का आधिकारिक दस्तावेज़ है।

विडंबना देखिए कि जिस पत्र की शुरुआत “वंदे मातरम्” जैसे राष्ट्रवादी उद्घोष से होती है, उसी पत्र में सरकार के अपने ही विधायक अफ़सरों की मानसिकता, कार्यशैली और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। यह स्थिति बताती है कि ज़मीन पर शासन पूरी तरह चरमराया हुआ है और मुख्यमंत्री कार्यालय तक वास्तविक हालात या तो पहुँच ही नहीं रहे, या फिर जानबूझकर अनदेखे किए जा रहे हैं।

सत्ता में रहते हुए असहाय विधायक

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि सत्ताधारी दल के विधायक ही यह कहने को मजबूर हों कि अफ़सर काम नहीं कर रहे, जनप्रतिनिधियों की बात नहीं सुन रहे और मनमाने ढंग से फैसले ले रहे हैं, तो आम नागरिक की हालत क्या होगी? यह पत्र इस सच्चाई को उजागर करता है कि गुजरात में चुने हुए प्रतिनिधि भी अब खुद को बेबस महसूस कर रहे हैं।

यह कोई पहला मामला नहीं है। 2017 के विधानसभा चुनावों के बाद भी वडोदरा के तीन विधायकों ने सर्किट हाउस में बैठक बुलाकर यही शिकायत की थी कि विकास कार्य ठप पड़े हैं और प्रशासन सुनवाई नहीं कर रहा। लगभग आठ साल बाद भी वही शिकायतें, वही अफ़सर और वही सरकार—सिर्फ़ चेहरे बदले हैं, व्यवस्था नहीं।

मुख्यमंत्री की चुप्पी क्या दर्शाती है?

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल स्वयं को सरल, शांत और प्रशासनिक संतुलन वाला नेता बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते। लेकिन सवाल यह है कि जब उनके अपने विधायक खुले तौर पर अफ़सरशाही के खिलाफ़ मोर्चा खोल दें, तो मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी क्या बनती है? क्या यह माना जाए कि मुख्यमंत्री अफ़सरों पर नियंत्रण खो चुके हैं, या फिर यह कि सरकार अफ़सरशाही के आगे पूरी तरह समर्पित हो चुकी है?

आज गुजरात में स्थिति यह बन चुकी है कि अफ़सर सत्ता के असली केंद्र बन गए हैं और मंत्री तथा विधायक केवल औपचारिक भूमिकाओं में सिमटकर रह गए हैं। यह लोकतंत्र के लिए बेहद ख़तरनाक संकेत है।

“डबल इंजन” सरकार का असली चेहरा

भारतीय जनता पार्टी वर्षों से “डबल इंजन सरकार” का ढोल पीटती रही है। लेकिन वडोदरा के विधायकों का यह पत्र साबित करता है कि यह इंजन अब जाम हो चुका है। ऊपर से नीचे तक समन्वय का अभाव है, संवाद टूट चुका है और प्रशासनिक अहंकार बेलगाम हो चुका है।

जब सत्ता पक्ष के विधायक ही मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अफ़सरों की शिकायत करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार के भीतर ही सब कुछ ठीक नहीं है। यह केवल वडोदरा की समस्या नहीं, बल्कि पूरे गुजरात की प्रशासनिक बीमारी का लक्षण है।

अफ़सरशाही बनाम जनप्रतिनिधि: किसकी चलेगी?

इस पत्र में अफ़सरों की “मानसिकता” पर उठाए गए सवाल बेहद गंभीर हैं। यह संकेत करता है कि अफ़सर जनप्रतिनिधियों को सम्मान नहीं दे रहे, जनसमस्याओं को हल्के में ले रहे हैं और सत्ता के संरक्षण में मनमानी कर रहे हैं। यदि यही स्थिति बनी रही, तो जनता का लोकतंत्र से विश्वास उठना तय है।

सरकार को यह तय करना होगा कि वह चुने हुए प्रतिनिधियों के साथ खड़ी है या फिर बेलगाम अफ़सरशाही के साथ। दोनों नावों पर पैर रखकर शासन नहीं चलाया जा सकता।

चेतावनी की घंटी

वडोदरा के पाँच विधायकों का पत्र मुख्यमंत्री के लिए चेतावनी की आख़िरी घंटी है। यदि अब भी सरकार ने अफ़सरशाही पर लगाम नहीं लगाई, जवाबदेही तय नहीं की और जनप्रतिनिधियों की आवाज़ को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले समय में इसका राजनीतिक और सामाजिक ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ेगा।

“वंदे मातरम्” से शुरू हुआ यह पत्र दरअसल गुजरात में सुशासन के दावों पर लगा एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री इसे राष्ट्रभक्ति का औपचारिक अभिवादन समझकर नज़रअंदाज़ करते हैं, या फिर इसे व्यवस्था सुधारने का अंतिम अवसर मानते हैं।

- Abhijit

09/01/2026