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Friday, February 27, 2026

राजनीति की बिसात पर 'सिंदूर': ट्रम्प का अहंकार, मोदी का मौन और लोकतंत्र की हार

अमेरिकी संसद (कांग्रेस) में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दूसरा 'स्टेट ऑफ द यूनियन' संबोधन केवल एक भाषण नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की संप्रभुता पर एक सीधा प्रहार था। मंच से दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति ने दावा किया कि 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य तनाव के दौरान उनके राजनयिक हस्तक्षेप ने न केवल परमाणु युद्ध टाला, बल्कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की जान भी बचाई। लेकिन इस पूरे प्रकरण में जो बात सबसे ज्यादा चुभती है, वह ट्रम्प का बड़बोलापन नहीं, बल्कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रहस्यमयी चुप्पी है।

'ऑपरेशन सिंदूर' और ट्रम्प का 'मसीहा' अवतार

साल 2025 का वह समय जब 'ऑपरेशन सिंदूर' के जरिए भारत ने सीमा पार आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद किया था, भारतीय जनमानस में गर्व के क्षण के रूप में अंकित है। लेकिन ट्रम्प के ताजा दावों ने इस पूरे सैन्य अभियान की स्वायत्तता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। ट्रम्प का कहना है कि उनकी वार्ता के बिना स्थिति परमाणु संघर्ष की ओर बढ़ रही थी और उन्होंने 3.5 करोड़ लोगों की जान बचाई।

प्रश्न यह उठता है कि क्या भारत की विदेश नीति अब वाशिंगटन के 'सफेद घर' से संचालित हो रही है? यदि ट्रम्प का दावा सही है, तो क्या 'ऑपरेशन सिंदूर' केवल एक सुनियोजित ड्रामा था जिसका अंत पहले से ही अमेरिकी मध्यस्थता के साथ तय था? और यदि यह गलत है, तो भारत सरकार ने अब तक इस पर कड़ा प्रतिवाद क्यों नहीं दर्ज कराया?

नरेंद्र मोदी: मौन या मजबूरी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी 'छप्पन इंच की छाती' और कड़क कूटनीति के लिए जाने जाते हैं। लेकिन ट्रम्प जब बार-बार भारत-पाकिस्तान के बीच 'युद्धविराम' कराने का श्रेय लूट रहे हैं, तब मोदी जी का यह 'मौन' उनकी छवि के विपरीत है। क्या यह चुप्पी किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव का परिणाम है या फिर व्यक्तिगत मित्रता की वेदी पर राष्ट्रीय गरिमा की बलि दी जा रही है?

भारत सरकार का यह कहना रहा है कि पाकिस्तान के साथ मुद्दे द्विपक्षीय हैं और किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं है। लेकिन जब ट्रम्प खुलेआम अमेरिकी संसद में खड़े होकर भारत की सैन्य कार्रवाई के नतीजों को अपनी उपलब्धि बताते हैं, तो सरकार की 'नो थर्ड पार्टी' वाली रट खोखली नजर आती है। प्रधानमंत्री का एक बार भी ट्रम्प को सार्वजनिक रूप से गलत न ठहराना, अप्रत्यक्ष रूप से उनके दावों को वैधता प्रदान कर रहा है।

शहबाज शरीफ की 'जान' और कूटनीति का गिरता स्तर

ट्रम्प का यह दावा कि उन्होंने शहबाज शरीफ की जान बचाई, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को किसी हॉलीवुड फिल्म के स्क्रिप्ट की तरह पेश करता है। यह न केवल पाकिस्तान की संप्रभुता का अपमान है, बल्कि भारत की उस सैन्य नैतिकता पर भी सवाल उठाता है जिसमें हम कभी भी निहत्थे राजनीतिक नेतृत्व को निशाना नहीं बनाते। ट्रम्प अपनी छवि को 'शांतिदूत' के रूप में चमकाने के लिए भारत और पाकिस्तान की संवेदनशीलता का इस्तेमाल कर रहे हैं।

भारत सरकार की विफलता

इस पूरे मामले में भारत सरकार की विफलता स्पष्ट है। पहली विफलता यह कि हम अपनी सैन्य उपलब्धियों का नैरेटिव (वृत्तांत) खुद नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी यह कि हम एक ऐसे मित्र राष्ट्र के प्रमुख को मर्यादा की सीमा समझाने में विफल रहे हैं जो बार-बार हमारे आंतरिक मामलों और द्विपक्षीय सैन्य संघर्षों में अपनी टांग अड़ा रहा है।

अभिजात वर्ग की कूटनीति के बंद कमरों में क्या खिचड़ी पक रही है, यह देश की जनता जानना चाहती है। क्या वाकई हम परमाणु युद्ध के इतने करीब थे? क्या वाकई भारत की सेना की उंगली ट्रिगर से ट्रम्प के फोन कॉल के बाद हटी? अगर नहीं, तो ट्रम्प के झूठ का पर्दाफाश तुरंत होना चाहिए।

राष्ट्र की गरिमा किसी भी विदेशी नेता की वाहवाही से बढ़कर है। डोनाल्ड ट्रम्प का अहंकार उनकी राजनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन भारत सरकार की चुप्पी हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए घातक है। प्रधानमंत्री मोदी को चाहिए कि वे ट्रम्प के इन दावों का खंडन करें और दुनिया को बताएं कि भारत अपने निर्णय खुद लेता है, किसी के 'हस्तक्षेप' के दबाव में नहीं।

लोकतंत्र में पारदर्शिता अनिवार्य है। यदि 'ऑपरेशन सिंदूर' का परिणाम वाशिंगटन की फाइलों में पहले से लिखा था, तो यह उन जवानों के साथ धोखा है जिन्होंने सीमा पर अपना लहू बहाया। अब समय आ गया है कि सरकार मौन तोड़े, वरना इतिहास इस चुप्पी को 'स्वीकारोक्ति' मान लेगा।

- Abhijit

27/02/2026