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Saturday, December 27, 2025

वसावा बनाम वसावा: विकास की राजनीति या वर्चस्व की जंग?

​​गुजरात की राजनीति में 'वसावा' सरनेम केवल एक उपनाम नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता और वोट बैंक का सबसे बड़ा केंद्र है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से नर्मदा और भरूच की धरती पर जो राजनीतिक ड्रामा चल रहा है, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब यह लड़ाई केवल विचारधारा की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत वर्चस्व और तीखे आरोपों की बन चुकी है।

​भाजपा के कद्दावर सांसद मनसुख वसावा और आम आदमी पार्टी (AAP) के युवा विधायक चैतर वसावा के बीच जारी यह ताजा विवाद अब एक ऐसे मोड़ पर आ गया है, जहाँ से राज्य की राजनीति में नए समीकरण बनने तय हैं।

​विवाद की जड़: 75 लाख का 'तोड़' या प्रशासनिक विफलता?

​इस पूरे विवाद का ताजा केंद्र मनसुख वसावा द्वारा लगाया गया वह सनसनीखेज आरोप है, जिसमें उन्होंने दावा किया कि चैतर वसावा ने प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों से जुड़े कार्यों के एवज में अधिकारियों से 75 लाख रुपये की मांग की है। मनसुख वसावा का कहना है कि आप विधायक पहले आरएंडबी (R&B) विभाग से जानकारी मांगते हैं और फिर अधिकारियों को डरा-धमकाकर 'वसूली' का प्रयास करते हैं।

​यहाँ सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मनसुख वसावा ने केवल विपक्षी विधायक पर ही हमला नहीं बोला, बल्कि अपनी ही सरकार के जिला कलेक्टर को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कलेक्टर इस वसूली की बात जानकर भी चुप हैं और चैतर वसावा से डरे हुए हैं।

​सांसद की धमकी: क्या भाजपा में सबकुछ ठीक है?

​मनसुख वसावा ने इस बार अपनी नाराजगी को एक कदम आगे बढ़ाते हुए भाजपा छोड़ने तक की धमकी दे दी है। उन्होंने कहा, "मैं सरकार और ईमानदार अधिकारियों के लिए लड़ रहा हूँ, लेकिन अगर मुझे न्याय नहीं मिला, तो मैं पार्टी छोड़ दूँगा।" यह बयान गुजरात भाजपा के भीतर की उस बेचैनी को भी उजागर करता है, जहाँ पुराने दिग्गज नेता अपनी ही पार्टी के कुछ स्थानीय विधायकों और प्रशासनिक अधिकारियों के तालमेल से खुश नहीं हैं। इससे पहले भी मनसुख वसावा ने अपनी ही पार्टी की विधायक दर्शना देशमुख पर चैतर वसावा को संरक्षण देने का आरोप लगाया था।

​चैतर वसावा का पलटवार: 'आदिवासी विरोधी साजिश'

​दूसरी ओर, चैतर वसावा ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे 'सस्ती लोकप्रियता' और 'आदिवासियों के बीच बढ़ते प्रभाव को रोकने की साजिश' करार दिया है। चैतर का तर्क है कि वे केवल विकास कार्यों में हो रहे भ्रष्टाचार और सड़कों की बदहाली का मुद्दा उठा रहे हैं, जिससे सांसद घबरा गए हैं।

​महत्वपूर्ण सवाल: राजनीति का गिरता स्तर

​इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

  1. ​क्या एक सांसद का अपनी ही सरकार के अधिकारियों पर सार्वजनिक रूप से अविश्वास जताना प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता नहीं है?
  2. ​क्या 75 लाख के 'तोड़' (वसूली) के आरोपों की कोई निष्पक्ष जांच होगी, या यह केवल चुनावी बयानबाजी बनकर रह जाएगा?
  3. ​क्या आदिवासी समाज के दो बड़े नेताओं की यह आपसी लड़ाई इस क्षेत्र के वास्तविक विकास के मुद्दों को पीछे नहीं धकेल रही?

​​गुजरात का आदिवासी बेल्ट हमेशा से आंदोलनों और अधिकारों की जमीन रहा है। लेकिन आज जब दो 'वसावा' दिग्गज आमने-सामने हैं, तो नुकसान क्षेत्र की जनता का हो रहा है। विकास कार्यों के नाम पर भ्रष्टाचार के आरोप और फिर उन पर राजनीतिक रोटियां सेंकना, यह खेल नया नहीं है। लेकिन मनसुख वसावा का इस्तीफा देने का अल्टीमेटम यह संकेत देता है कि यह विवाद केवल एक प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित नहीं रहेगा।

​आने वाले दिनों में देखना दिलचस्प होगा कि गांधीनगर और दिल्ली का भाजपा नेतृत्व अपने 'बागी' तेवर वाले सांसद को कैसे मनाता है और चैतर वसावा इन गंभीर आरोपों से खुद को कैसे बेदाग साबित करते हैं।

- Abhijit

27/12/2025